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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

"धारा"

(This image has been taken from Google)

जोड़ती  तटबन्ध
करती समृद्धि का उद्घोष
संस्कृति की पोषक
मानवता की रक्षक
धारा ……, जब
मन्थर हो कर बहती है
नई राहें खोजती
ध्वंसावशेष छोड़ती
गर्व के मद में चूर
हो विवेक शून्य दौड़ती
धारा ….., जब
उन्मुक्त गति से बहती है
मन मानव का.., जीये चाहे वैसा
जीवन है अपना....,धारा के जैसा

xxxxxxx






12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति मीना जी¡
    धारा और मानव जीवन वाह उम्दा।

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    उत्तर
    1. आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया से रचना को सार्थकता मिली कुसुम जी ! हार्दिक आभार ।

      हटाएं
  2. हर धरा संचार करती है बहा ले जाती है जल तो कभी मन के भाव तो कभी प्रगति की राह की और ... सतत चलने का नाम ही धरा है ... सुन्दर रचना ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. रचना को सार्थकता प्रदान करती उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार नासवा जी ।

      हटाएं
  3. सुंदर.... रचना मीना जी ,सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सुन्दर सी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार कामिनी जी ।

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार विश्वमोहन जी ।

      हटाएं
  5. वाह!!!
    बहुत सुन्दर.... लाजवाब...।

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"