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बुधवार, 30 दिसंबर 2020

"नये साल में"

                     

मंगल मोद मनाये 

कुछ हँस ले कुछ गाए 

नये साल में...

भूलें जो दुःस्वप्न सरीखा था

जो भी था 

सब अपना था

आशा के दीप जलाए

नये साल में..


प्रकृति का खिला

 अंग-प्रत्यंग

सृष्टि का दिखा 

अभिनव सा रंग

बंद घरों में रह कर सीखा

जीने का एक नया ढंग 

खुल जाएँ आंगन-द्वार

नये साल में…


समय के बहते दरिया में

आए कब ठहराव यहाँ...

था वो भी कल

 जो बीत गया

 वो भी है कल

 जो आएगा

सब अच्छा हो इस बार

नये साल में..

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【 चित्र-गूगल से साभार 】


गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

"यादें"

 


आधी सी रात  में..

धीमे से बादल उतरते ।


मोती सी तुषार बूँदें..

सरसों पर देखी बिखरते ।


ऊन जैसा परस तेरा..

सर्दियों के दिन हठीले ।


चाय की वो चुस्कियाँ..

शीत लहरों में ठिठुरते ।


कहा भरे दिल से विदा...

रोये फिर मुझ से बिछुड़ के ।


 मैं तुम्हें कैसे  बताऊँ...

दिन ये इतने कैसे बीते ।


धूप के बिन लगे देखो ...

दिन भी रोते और बिसूरते ।

--

 【 चित्र :- गूगल से साभार 】


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

"सांध्यगीत"

                    

धीरे धीरे सांझ उतरी ,

जीवन में गोधूलि बेला ।

रीत जगत की चली आई  ,

जीना चार दिन का खेला ।।


हाथों में हैं नवल पाटल ,

दृग संजोते नई आशा ।

गा के सांध्य गीत कोई ,

भरे मन में नव प्रत्याशा ।।


कौन है  ऐसा जगत में ,

जिसने ना एकांत झेला ।

रीत जगत की चली आ रही ,

जीना चार दिन का खेला ।।


आ रही सागर से लहरें ,

बन के तेरी संगी  साथी ।

करती तन्द्रा भंग तेरी ,

वापस किनारे लौट जाती ।।


तेरे दुख सुख की ये साझी ,

क्यों समझे खुद को अकेला ।

रीत जगत की चली आ रही ,

जीना चार दिन का खेला ।।


जल उठे ये प्रकाश स्तंभ ,

अब क्या  बैठा सोचता है ।

भरा पूरा उपवन सा घर ,

वो तेरी बाट जोहता है ।।


देख विहग घर लौटते हैं ,

कल होगा फिर से सवेरा ।।

रीत जग की चली आ रही ,

जीना चार दिन का खेला ।।


🍁🍁🍁


मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

"आँखें"

उस पार बंधी है

लौकिक नैया 

 कौन खिवैया

तम की चादर 

कर पार..

भेद खोलना चाहती हैं


थकन भरी  है

आँखों में

बहुत दिन बीते

चैन से सोये

नींद भरे सागर में 

आँखें खोना चाहती हैं


***


बुधवार, 9 दिसंबर 2020

मुस्कुराहट लबों पर...

                           

मुस्कुराहट लबों पर, सजी रहने दीजिए ।

ग़म की टीस दिल में, दबी रहने दीजिए ।।

 

छलक उठी हैं ठेस से, अश्रु की कुछ बूंद ।

दृग पटल पर ज़रा सी,नमी रहने दीजिए


 राय हो न पाए अगर ,कहीं पर मुक्कमल।

मिलने-जुलने की रस्म,बनी रहने दीजिए ।।


बिगड़ी हुई बात है,कल संवर भी जाएगी ।

लौ है उम्मीद की बस,जली रहने दीजिए ।।


 फूल सी है ज़िंदगी, तो कांटे संग हजार

 कुदरत से बनी लकीर, खिंची रहने दीजिए


***

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

"मन"

                          

सांझ की...

दहलीज़ पर

कभी हाँ…

तो कभी ना में

 उलझा …

घड़ी के पेंडुलम सा

स्थिरता..

की चाह में झूलता

स्थितप्रज्ञ मन…


हक के साथ

बोनस में

जो मिल रहा है

उसकी..

चाह तो नहीं रखता

वैसे ही…

मन बेचारा

निर्लिप्त जीव है

तुम्हारी सौगातें

जो भी है...

सब की सब

सिर आँखों पर..


यहाँ..

सारा का सारा

आसमान...

कब और किसको 

मिला है..

यह मन ही 

पागल है...

मिठास की चाह भी 

रखता है..

और वह भी

 खारी सांभर से...


***

【चित्र~गूगल से साभार】