आविर्भाव के साथ ही
धीमे- धीमे गीत गाती हैं
भोर की किरणें
स्वर्णिम सी उजास में उनकी
गुनगुनाहट
आँखें बंद करके मैंने
बहुत करीब से सुनी है
दिन भर की गहमागहमी में
यही गुनगुनाहट
कहीं खो सी जाती है
चाह कर भी सुनना चाहूँ
तो भी
दिन में मैं नहीं सुन पाती वह
मध्दम मधुर आवाज़
ढलती सांझ के
धुँधलके में धीमे-धीमे
सरकती सी
वह आती है मेरे समीप
मानो मुझसे कह रही हो —
जीवन का सार यही तो है
कुछ पाने की चाह में
हम दिन भर भागते रहते हैं
और अंततः
ठहरना ही सीखते हैं ।
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