जब पछुआ खेतों की..,
मेड़ों से ठंडी खबर लेकर आती
तो देह ही नहीं,
मन भी सिहर उठता ।
बरखा की पहली बूँद
कच्चे आँगन पर गिरने के साथ ही
मिट्टी से उठती सोंधी गंध और
हँसी के अंकुर..,
बौछार बन बरसने लगते ।
बारिशें अब भी हैं,
मगर…
खिड़कियों पर शीशे हैं,
दरवाज़ों पर कुंडियाँ हैं,
घर के भीतर
मौसम से बचा जीवन है।
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- "मीना भारद्वाज"