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सोमवार, 2 नवंबर 2026

“नौसम”

जब पछुआ खेतों की..,
 मेड़ों से ठंडी खबर लेकर आती
 तो देह ही नहीं,
 मन भी सिहर उठता ।

बरखा की पहली बूँद
  कच्चे आँगन पर गिरने के साथ ही

 मिट्टी से उठती सोंधी गंध और
 हँसी के अंकुर..,
 बौछार बन बरसने लगते । 

बारिशें अब भी हैं,
 मगर…

 खिड़कियों पर शीशे हैं,
 दरवाज़ों पर कुंडियाँ हैं,
 घर के भीतर
 मौसम से बचा जीवन है।

***


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- "मीना भारद्वाज"