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सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

"लहरें"

पूर्णिमा की रात
सागर का क्रोध
 पूरे चरम पर था
और...
लहरों की चंचलता
सीमाओं से बाहर...
वह बाँधना चाहता था
लहरों को … 
मगर अनियन्त्रित लहरें
कहाँ और कब.. 
किसी की सुनती हैं
अपनी ही मौज में रहती हैं 
जब होना चाहती हैं  निर्बन्ध
 तो करती हुई वर्जनाओं को
दर किनार….
बस आ ही जाती है 
इस पार ...।

★★★★★

22 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(18-02-2020 ) को " अतिथि देवो भवः " (चर्चा अंक - 3622) पर भी होगी

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का

    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चर्चा मंच की कल की प्रस्तुति में मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार कामिनी ! सस्नेह वन्दन ।

      हटाएं
    2. सुंदर लिखा आपने लहरें कब कहां किसी की सुनती है वह तो अपनी ही मौज मस्ती में ठहाके लगाती हुई किनारों को छूकर वापस आ जाती है हम सब को भी समुद्री लहरों से सीखना चाहिए

      हटाएं
    3. आपकी सारगर्भित समीक्षात्मक प्रतिक्रिया से लेखन को सार्थकता मिली अनु जी ! हृदय से आभार आपका ।

      हटाएं
  2. बहुत सुन्दर मीनाजी ! लेकिन मेरा तो यह मानना ही कि पूनम की रात में समुन्दर गुस्से में नहीं आता, बल्कि उस में इश्क़ का जूनून जग जाता है और उसका मन मचल-मचल जाता है.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. पूर्णिमा की रात्रि में उठते ज्वार की हलचल को युवा शक्ति की ऊर्जा से जोड़ा है सर ! मन में आए भावों के लिए एक तुच्छ सा प्रयास..., आपकी प्रतिक्रिया सदैव सृजन के लिए मार्गदर्शन करती है ।

      हटाएं
  3. लाजवाब मीना जी छोटे से बंध में जीवन गूंथ दिया ।
    बहुत सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी स्नेह से पगी उर्जावान प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ कुसुम जी ।

      हटाएं
  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सखी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से लेखन को सार्थकता मिली ...स्नेहिल आभार सखी ।

      हटाएं
  5. मगर अनियन्त्रित लहरें
    कहाँ और कब..
    किसी की सुनती हैं
    अपनी ही मौज में रहती हैं

    बिलकुल सही कहा आपने ,लाज़बाब , बेहतरीन अभिव्यक्ति मीना जी ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन को सार्थकता देती आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ सखी ! सस्नेह वन्दे !

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  6. ik lmbe antraal baad blog jagat ki aur aana huya ....magar kuch blogs me haaziri zarur lgaati hun taaki achii rchnaaon ka swaad jheebh chakh ske


    जब होना चाहती हैं निर्बन्ध
    तो करती हुई वर्जनाओं को
    दर किनार….

    aana safal huya

    bdhaayi ik sashakat rchnaa ke liye

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. व्यस्तता के बाद आपका ब्लॉग जगत में आना और मेरा लेखन याद रखना..यह मेरे लिए हर्ष की बात है । बहुत बहुत आभार आपका.. आपकी प्रतिक्रिया से लेखन सार्थक हुआ जोया जी ।

      हटाएं
  7. करती हुई वर्जनाओं को
    दर किनार….
    बस आ ही जाती है
    इस पार ...।

    बहुत खूब प्रिय मीना जी | लहरों की प्रबलता के आगे कोई बंध कब टिक पाया है ? इनके ज्वार जड़ता में चैतन्य के प्रेरक सन्देश देते हैं | सस्नेह --

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी अनमोल सराहना पाकर लेखन सफल हुआ प्रिय रेणु जी ।आपका स्नेह बना रहे.. हृदयतल से आभार । सस्नेह...

      हटाएं
  8. कहाँ और कब..
    किसी की सुनती हैं
    अपनी ही मौज में रहती हैं

    .............बिलकुल सही कहा

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"