Followers

Copyright

Copyright © 2021 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

रविवार, 2 मई 2021

।। क्षणिकाएं।।

                 

लबों को रहने दो खामोश

काफी है, 

आँखों की मुस्कुराहट ।

बर्फ ही तो है

इस आँच से ,

बह निकलेगी ।

**

हौंसला और जिजिविषा

 देन है तुम्हारी ।

 विश्वास की डोर का 

छोर भी ,

तुम्हीं से बंधा है ।

जानती हूँ 

रात के आँचल के छोर से,

यूं ही तो बंधी होती है ।

उजली भोर के,

सुनहरे आँचल की गाँठ ।

**

 कई बार

अनुभूत पलों का,

मुड़ा-तुड़ा कोई पन्ना ।

बाँचना चाहती हैं आँखें ,

मगर 

इज़ाज़त कहाँ देता है ,

जटिल बुनावट वाला विवेक ।

समझदारी के फेर में

कस कर मूंद  देता है ,

सुधियों भरा संदूक ।

**


23 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (03-05 -2021 ) को भूल गये हैं हम उनको, जो जग से हैं जाने वाले (चर्चा अंक 4055) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चर्चा मंच की प्रस्तुति में सृजन को सम्मिलित करने हेतु सादर आभार रवीन्द्र सिंह जी।

      हटाएं
  2. विश्वास की डोर का

    छोर भी ,

    तुम्हीं से बंधा है ।

    जानती हूँ

    रात के आँचल के छोर से,

    यूं ही तो बंधी होती है ।

    उजली भोर के,

    सुनहरे आँचल की गाँठ ।---वाह...कितना खूबसूरत लिखा है आपने मीना जी। बहुत बधाई। सभी पंक्तियां अपने अर्थ पर खरी उतर रही हैं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न टिप्पणी ने लेखन का मान बढ़ाते हुए उत्साहवर्धन किया । हार्दिक आभार संदीप शर्मा जी ।

      हटाएं
  3. **

    हौंसला और जिजिविषा

    देन है तुम्हारी ।

    विश्वास की डोर का

    छोर भी ,

    तुम्हीं से बंधा है ।

    जानती हूँ

    रात के आँचल के छोर से,

    यूं ही तो बंधी होती है ।

    उजली भोर के,

    सुनहरे आँचल की गाँठ ।...बहुत सुंदर लिखा है,मीना जी,इस क्षणिका ने तो मन मोह लिया,दर्द नमन आपको ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार जिज्ञासा जी ।

      हटाएं
  4. वाह क्या खूब लिखा आपने

    जवाब देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. सुन्दर सराहना भरी टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार शिवम् जी।

      हटाएं
  6. समझदारी का फेर वाक़ई इतना भी नहीं होना चाहिए मीना जी कि सुधियों की भी सुध लेना हमसे छूट जाए। ज़िन्दगी यादों के बिना है ही क्या? बहुत अच्छी क्षणिकाएं हैं ये आपकी।

    जवाब देंहटाएं
  7. इसलिए तो विवेक को जटिल बुनावट वाला कहा..मन की सरलता तो वहीं रहती है ना अतीत की वीथियों में । बहुत बहुत आभार जितेन्द्र जी इतने सुन्दर कथ्य के लिए ।

    जवाब देंहटाएं
  8. उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार विकास जी।

      हटाएं
  9. बहुत गहरी अभिव्यक्ति ... क्षणिकाओं की खूबी यही ही वो सोचने को मजबूर बाल्टी हैं ... अनेक अर्थ निकल के आते हैं ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न टिप्पणी ने लेखन का मान बढ़ाते हुए उत्साहवर्धन किया । हार्दिक आभार नासवा जी ।

      हटाएं
  10. सोचने को मजबूर करती बहुत ही सुंदर क्षणिकाएं, मीना दी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ज्योति जी।

      हटाएं
  11. उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक सर.

      हटाएं
  12. पग-पग पर जीवन इन्हीं विरोधाभासों से ही उलझाकर डांवाडोल करता रहता है । अति सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"