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शनिवार, 24 जुलाई 2021

सुनहरी धूप का टुकड़ा...

 



कई दिनों से

 लगातार..

 बरस रहे हैं

 काले बादल

तुम्हारी तरफ से

आने वाली 

पछुआ के साथ

अंजुरी भर धूप की

 एक गठरी भेज दो

उन्हीं  के छोर से

मैं भी बांध दूंगी

थोड़ी सी नमी 

धूसर बादल के साथ

पता है.. जब,

धरती पर उतरते

 बादलों के संग

पानी की बौछारें 

बरसती हैं 

धुआं सी तो,

 दृग पटल भी

थक कर 

धुंधलाये से लगते हैं

कब निकलेगा

 बादलों की ओट से

सुनहरी धूप का टुकड़ा

बस…,

उसी की राह तकते हैं


★★★


22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!लाजवाब दी 👌

    कल दिन के अंतिम पहर में
    भेजा है मैंने धूप का एक टुकड़ा
    दुआओं की लीर में लपेटकर
    तुम्हारे लिए
    तुमने भी वादा किया था
    बौछारों के साथ
    स्नेह का बंडल भेजने का...।
    बहुत बहुत सुंदर सृजन सराहनीय।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी नेह पगी प्रतिक्रिया ने मेरे सृजन को पूर्णता प्रदान की अनीता जी । अभिभूत हूँ आपकी प्रतिक्रिया पा कर...हृदयतल से असीम आभार । सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  2. बहुत सुंदर सृजन, मीना दी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ज्योति जी।

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार मनीषा जी!

      हटाएं
  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२५-०७-२०२१) को
    'सुनहरी धूप का टुकड़ा.'(चर्चा अंक-४१३६)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. चर्चा मंच पर सृजन को मान देने के लिए हृदय से आभार
    अनीता जी । चर्चा के शीर्षक के रूप में भी सृजन को मान देने के लिए आभारी हूँ ।

    जवाब देंहटाएं
  6. धुआँ धार बारिश के बाद सच ही सुनहरी धूप की ज़रूरत होती है । सुंदर सृजन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की., असीम आभार मैम 🙏

      हटाएं
  7. आशा और जिजीविषा की सुनहरी धूप ... अति सुन्दर भाव सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की., असीम आभार अमृता जी!

      हटाएं
  8. उम्मीद की किरण बिखेरती सुन्दर,सार्थक रचना, बहुत शुभकामनाएं मीना जी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार जिज्ञासा जी!

      हटाएं
  9. बहुत खूब लिखा है। हमारे यहाँ कुछ उल्टा हो रखा है। धूप है। तेज उमस है और झमाझम बारिश का बेसब्री से इंतज़ार है। उम्मीद है इंद्रदेव निराश नहीं करेंगे। सादर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपके यहाँ भी बारिश होने लगी होगी । प्रकृति और इन्द्र देव की कृपा देर-सवेर हो ही जाएगी । हार्दिक आभार वीरेन्द्र जी सृजन सराहना हेतु ।

      हटाएं
  10. हर ऋतु की अपनी विशेषता होती है । उसका जाना भी वैसे ही खलने लगता है जैसे प्रिय का जाना । बेहद सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सर्वप्रथम हार्दिक स्वागत आपका "मंथन" आपकी सारगर्भित अनमोल प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की । हार्दिक आभार सुनीता जी!

      हटाएं
  11. उत्तर
    1. आपकी उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार सर!

      हटाएं

  12. थक कर
    धुंधलाये से लगते हैं
    कब निकलेगा
    बादलों की ओट से
    सुनहरी धूप का टुकड़ा
    बस…,
    उसी की राह तकते हैं
    काले गरजते बादल जब दृगपटल पर छा जाते जते हैं तो सुनहरी धूप की खुशियाँ बस दृग पटलों के बाहर ही खड़ी हैं मानों बस जितना बरसना हैं बरसे ये मेघा फिर तो खुशियों की धूप चमकनी ही है।
    बहुत सुन्दर सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहनीय सारगर्भित प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की । हार्दिक आभार सुधा जी!

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"