Copyright

Copyright © 2026 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

“बोनसाई”

एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की 

नर्म देह पर..

टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच


घुटनों के बल झुककर

मैंने तुम्हारा नाम लिखा था

अपनी तर्जनी की नोक से


शायद अपने साथ तुम्हारा अहसास 

महसूस करने के लिए 


फिर एक दिन,

अचानक मन में अपनी ही 

उस मासूमियत को टटोलने की

 अधूरी-सी इच्छा जागी—


तो पाया

भूरी, बेजान रेत के विस्तार पर

ईंट-पत्थरों का कठोर जंगल उगा है,


और जहाँ कभी

मेरे स्पर्श से तुम्हारा नाम सांस लेता था,

वहीं अब

 मनभावन मगर  सीमाओं में बंधा

बोन्साई का पेड खड़ा है


***