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रविवार, 4 फ़रवरी 2024

“आदमी”

फूलों के भरम में बोता बबूल

काँटे की चुभन से रोता हूँ मैं 


तैरना मैं जानता नहीं 

भंवर में पैर रोपता हूँ मैं


ढूँढता हूँ पहचान अपनी

अनचीन्हें बोझ ढोता हूँ मैं


हूँ अपनी आदत से  मजबूर

सपनों में बहुत खोता हूँ मैं


 दर्द के दरिया में डूबा हुआ 

 हँसने की बहुत सोचता हूँ मै


***



14 टिप्‍पणियां:

  1. फूलों के भरम में बोता बबूल....
    बहुत सुंदर गहन अर्थ समेटे भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी।
    सस्नेह।
    सादर।
    ----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ फरवरी २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली, सस्नेह हार्दिक आभार श्वेता जी ! पाँच लिंकों का आनन्द में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हृदयतल से आभार । सस्नेह वन्दे !

    जवाब देंहटाएं
  3. दर्द के दरिया में डूबा हुआ

    हँसने की बहुत सोचता हूँ मै
    बहुत सटीक...सार्थक एवं सारगर्भित
    लाजवाब सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया पा कर सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार सुधा जी ! सादर वन्दे !

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार सर ! सादर वन्दे !

      हटाएं
  5. नायाब कव‍िता ...वाह मीना जी...बहुत खूब ल‍िखा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया पा कर सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार अलकनन्दा जी ! सादर वन्दे !

      हटाएं
  6. हूँ अपनी आदत से मजबूर

    सपनों में बहुत खोता हूँ मैं

    सपने थोड़ी देर के लिए सुकुन तो दे ही देते हैं तो उसमें को जाना भी अच्छा ही है, लाजवाब सृजन मीना जी 🙏

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार कामिनी जी ! सादर वन्दे !

    जवाब देंहटाएं
  8. उत्तर
    1. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार सर ! सादर वन्दे !

      हटाएं
  9. उत्तर
    1. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से आभार नासवा जी ! सादर वन्दे !

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"