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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

“संवेदनाएँ”

रुई के फाहों से  ढक गए हैं

देवदार ..,

धरती पर भी नमक सी बिखर गई है

बर्फ़…, 


पास ही पहाड़ की बाहों में

लिपटे घर से

नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर 

गूँज उठता है -

लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,

हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,

मायें मेरिये, शिमले दी रावें,

चम्बा कितनी दूर…, 

चम्बा कितनी दूर…!”


सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ 

एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन 

ढलकने लगती हैं 

ना गीत को पता..,

ना गाने वाली आवाज़ को..,

बस..,

दर्द  दरिया बन 

 दो अजनबियों के बीच बेआवाज़

 बहने लगता हैं 


संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख

वे सदियों से 

यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं 


***