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बुधवार, 11 मार्च 2026

“डोर”

खामोशी की डोर से 

बँध कर हम 

चले जा रहे हैं किनारे-किनारे 

और..,

 बीच में पसरा पड़ा है 

कभी न सिमटने वाला 

सन्नाटा.., 

फासला तो अधिक नहीं है 

हमारे बीच

मगर सोचों  की गहराई का 

छोर..,

दूर -दूर तक नहीं दीखता 


***


14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 12 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. पांच लिंकों का आनन्द” में सृजन को सम्मिलित करने हेतु आपका हृदय तल से सादर आभार

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  3. इसी सन्नाटे की गहराई में छिपा है एक अटूट अपनापन, जिसे कोई भी दूरी मिटा नहीं सकती

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  4. खामोशी की डोर से

    बँध कर हम

    चले जा रहे हैं किनारे-किनारे

    .............लाजबाब............

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  5. हृदय तल से असीम आभार मनोज भाई जी !

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  6. जो बात आपने कही है मीना जी, उसकी गहराई भी अथाह है।

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  7. जो बात आपने कही है मीना जी, उसकी गहराई भी अथाह है।

    जवाब देंहटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"