सांसारिकता की किताब में
एक धुरी पर आकर
व्यक्ति की भागम-भाग का
रथ ठहर जाता है
एक पड़ाव पर..,
निवृत्ति की प्रवृत्ति को
परिभाषित करना
थोड़ी टेढ़ी खीर है
क्योंकि..,
समय के रथ का पहिया
तो नहीं रूकता लेकिन
मानव मन
आज और कल के बीच
हिलकोरे खाता..,
आ कर ठहर जाता है
आज की दहलीज़ पर
समय के भँवर में
डूबता उतराता
विरक्ति को भूल अनुरक्ति की ओर
कब प्रवृत्त होता है ..,
उसके स्वयं के अहसासों से
परे की बात है ॥
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