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गुरुवार, 25 अगस्त 2022

“दीवार”


खिचीं हुई है एक

अन्तर्द्वन्द्व की अभेद्य दीवार 


हर बार की तरह

इस बार भी लगता है 

एक कोशिश और यह

बस..,

भरभरा कर गिरने ही वाली है 

मगर कहाँ..,


हर बार की तरह इस बार भी

मेरे यक़ीन का ‘और’ और.., ही रहा 


अंगुलियों से रिसती लालिमा 

के साथ..,

हथेलियों की थकावट 

यह याद दिलाने के लिए 

काफ़ी है कि


प्रयासों में ही कहीं कमी रह गई है 

कोशिश जारी रखनी चाहिए 

थोड़ी मेहनत की और दरकार होगी


***

18 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 🙏

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  2. हाँ मीना जी। पानी की धार बिना रुके गिरती रहे तो कभी-न-कभी पत्थर पर निशान पड़ ही जाता है।

    जवाब देंहटाएं
  3. उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार जितेन्द्र जी 🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२९-०८ -२०२२ ) को 'जो तुम दर्द दोगे'(चर्चा अंक -४५३६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. चर्चा मंच की चर्चा में सृजन को सम्मिलित करने के लिए बहुत बहुत आभार अनीता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह मीना जी !
    आपने कवि सोहनलाल द्विवेदी की अमर रचना - 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' की याद दिला दी.

    जवाब देंहटाएं
  7. सुप्रभात सर 🙏
    उत्साहवर्धन करती आपकी प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभारी हूँ ।

    जवाब देंहटाएं
  8. थोड़ी मेहनत की दरकार होगी ।
    सराहनीय सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत बहुत आभार ज्योति-कलश जी ।

    जवाब देंहटाएं
  10. अन्तर्द्वन्द्व की दीवार गिरानी ही होगी...थोड़ी और मेहनत ही सही
    वाह!!!
    बहुत सुन्दर।

    जवाब देंहटाएं
  11. आपका बहुत बहुत आभार सुधा जी!

    जवाब देंहटाएं
  12. हृदय से असीम आभार अमृता जी ! सादर सस्नेह वन्दे !

    जवाब देंहटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"