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रविवार, 8 जनवरी 2023

“क्षणिकाएँ”


लोकल ट्रेन के मुसाफ़िरों की तरह

इमारतों की भीड़ में

खड़े हैं कुछ पेड़ 

किंकर्तव्यविमूढ़ और सहमे से

बढ़ती भीड़ को देख कर

तय नहीं कर पा रहे कि अब 

कितना और सिमटे ॥


***


अक्सर मैं 

हाथ की लकीरों में

तुम्हें ढूँढा करती हूँ 

क्या पता …,

गूगल मैप की तरह इनमें 

तुम्हारी कोई 

निशानदेही कहीं मिल ही जाए ॥


***


चाँद भी रचता है 

कविताएं..

जब धवल चाँदनी में लिपटा

उतरता है , 

नीलमणि सी जलराशि में

तब ..

लहर लहर में 

खिल उठते हैं 

नीलकमल सरीखे शब्द ॥


***

28 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सराहना भरे शब्दों से उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार आ.ओंकार सर ! सादर वन्दे ।

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  2. आपकी लिखी रचना सोमवार 9 जनवरी 2023 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. पाँच लिंकों का आनन्द में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीया दीदी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. आपकी उत्साहवर्धन करती सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ आ. दीदी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  4. अक्सर मैं
    हाथ की लकीरों में
    तुम्हें ढूँढा करती हूँ
    क्या पता …,
    गूगल मैप की तरह इनमें
    तुम्हारी कोई
    निशानदेही कहीं मिल ही जाए ॥

    चाँद भी रचता है
    कविताएं... .

    मन को छुती शब्दों कि कियारी ॥
    बेहतरीन सृजन / उम्दा /

    जवाब देंहटाएं
  5. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार 🙏

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह! तीनों रचनाएँ नि:शब्द कर जाती हैं, दिल को छूता हुआ सृजन!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहनीय प्रतिक्रिया पा कर सृजन सार्थक हुआ ।हार्दिक आभार अनीता जी!
      सादर सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  7. वाह!मीना जी ,बहुत खूब! तीनों क्षणिकाएं लाजवाब ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन को सार्थकता प्रदान करती सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार शुभा जी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  8. आहा दी कितनी सुंदर और भावपूर्ण क्षणिकायें हैं। सारी अच्छी हैं पर अंतिम वाली बहुत बहुत बहुत अच्छी लगी।
    --------
    बादलों की घाटियों में
    फूल,पौधे,घर,सड़क
    रंग सारे खो गये
    पार क्षिति के गाँव
    सूरज जगे
    नभ के नीले ताल पर
    कुमुदनियों के
    टँके चमकदार बूटे।
    ----
    सस्नेह प्रणाम दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी ऊर्जावान स्नेहिल प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया श्वेता । हृदयतल से स्नेहिल आभार । सस्नेह…।

      हटाएं
  9. आहा दी कितनी सुंदर और भावपूर्ण क्षणिकायें हैं। सारी अच्छी हैं पर अंतिम वाली बहुत बहुत बहुत अच्छी लगी।
    --------
    बादलों की घाटियों में
    फूल,पौधे,घर,सड़क
    रंग सारे खो गये
    पार क्षिति के गाँव
    सूरज जगे
    नभ के नीले ताल पर
    कुमुदनियों के
    टँके चमकदार बूटे।
    ----
    सस्नेह प्रणाम दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी ऊर्जावान स्नेहिल प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया श्वेता । हृदयतल से स्नेहिल आभार । सस्नेह…।

      हटाएं
  10. अक्सर मैं 

    हाथ की लकीरों में

    तुम्हें ढूँढा करती हूँ 

    क्या पता …,

    गूगल मैप की तरह इनमें 

    तुम्हारी कोई 

    निशानदेही कहीं मिल ही जाए...मन को छूती सराहनीय क्षणिकायें।
    बहुत ही सुंदर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया पाकर सृजन सार्थक हुआ । हृदयतल से स्नेहिल आभार । सस्नेह..।

      हटाएं
  11. गागर में सागर सी क्षणिकाएं सखी बहुत ही सुन्दर और बहुत कुछ बोलती

    जवाब देंहटाएं
  12. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने लेखनी को नव ऊर्जा प्रदान की ।हृदय से असीम आभार सखी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

    जवाब देंहटाएं
  13. अक्सर मैं

    हाथ की लकीरों में

    तुम्हें ढूँढा करती हूँ

    क्या पता …,

    गूगल मैप की तरह इनमें

    तुम्हारी कोई

    निशानदेही कहीं मिल ही जाए ॥
    वाह!!!!
    सचमुच गागर में सागर सी
    लाजवाब क्षणिकाएं ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने लेखनी को नव ऊर्जा प्रदान की ।हृदय से असीम आभार सुधा जी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  14. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार (12-1-23} को "कुछ कम तो न था ..."(चर्चा अंक 4634) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चर्चा मंच की चर्चा में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार कामिनी जी 🙏

      हटाएं

  15. चाँद भी रचता है
    कविताएं..
    जब धवल चाँदनी में लिपटा
    उतरता है ,
    नीलमणि सी जलराशि में
    तब ..
    लहर लहर में
    खिल उठते हैं
    नीलकमल सरीखे शब्द ॥

    कितनी सुंदर क्षणिकाएं। एक एक शब्द मन में उतरता हुआ । बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  16. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया ने लेखनी को नव ऊर्जा प्रदान की ।हृदय से असीम आभार जिज्ञासा जी ! सादर सस्नेह वन्दे ।

    जवाब देंहटाएं
  17. बेहतरीन क्षणिकाएं ... मन की भावनाओं को तरंगित करती हुई ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन को मान मिला । हार्दिक आभार आ. नासवा जी ! सादर वन्दे ।

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"