खामोशी की डोर से
बँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
और..,
बीच में पसरा पड़ा है
कभी भी न सिमटने वाला
सन्नाटा..,
फासला तो अधिक नहीं है
हमारे बीच
मगर सोचों की गहराई का
छोर..,
दूर -दूर तक नहीं दीखता
***