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बुधवार, 11 मार्च 2026

“डोर”

खामोशी की डोर से 

बँध कर हम 

चले जा रहे हैं किनारे-किनारे 

और..,

 बीच में पसरा पड़ा है 

कभी भी न सिमटने वाला 

सन्नाटा.., 

फासला तो अधिक नहीं है 

हमारे बीच

मगर सोचों  की गहराई का 

छोर..,

दूर -दूर तक नहीं दीखता 


***