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गुरुवार, 11 जनवरी 2024

“तलाश”

भूलना चाहती हूँ मैं

अपने आप को

मेरी स्मृतियाँ गाहे-बगाहे 

बहुत शोर करती हैं 

कोलाहल से दूर 

मुझे मेरे सुकून की तलाश है 


किसी पहाड़ से गिरते 

झरने की हँसी के साथ 

मुस्कुराये बेतरतीब घास की 

ओट से कोई जंगली फूल 

देखे मेरी ओर..,और

मुझे मुझी से  भुला दे

मुझे उस पल की तलाश है


अक्सर पढ़ने-सुनने में 

आता है - “ज़िन्दगी बसती है 

किताबों से परे” 

लेकिन ….

सांसारिक महाकुंभ में मुझे

गंगा-यमुना की नही

 लुप्त सरस्वती की तलाश है 


***

सोमवार, 1 जनवरी 2024

“ज़िंदगी”

कैलेण्डर के पहले पन्ने की 

पहली तारीख़ को हमेशा से

करने थे कुछ संकल्प 

खुद के लिए खुद से


समय के महासागर में कभी 

खुद की तलाश में

कभी अपने अपनों की ख़ातिर 

अपने ही वादे-इरादे

भूल जाया करता है आदमी 


आने वाला हर नया साल

एक के बाद एक इस तरह 

गुजर जाता है समीप से

जैसे पतझड़ में कोई ज़र्द पत्ती

झड़ी हो किसी चिनार से


कोई बात नहीं..,

पतझड़ है तो वसन्त भी है 

समय है तो उम्मीद है और

उम्मीद पर दुनिया कायम है

ज़िन्दगी इसी का नाम है 


***

शनिवार, 30 दिसंबर 2023

“समय-देहरी”

धीरे-धीरे समय का

रिक्त घट

आज की देहरी पर

आन खड़ा है 

परिवर्तित होने कल में


आने वाला कल भी 

खड़ा है देहरी के 

उस पार..

समय के भरे घट 

के साथ 


फिर वही दिन..,

 फिर वही रात 

नई उमंगें…,

नये संकल्प नई आशाओं

 के साथ 


समय-घट..,

भरता है ,रीतता है 

और हम

 आज के आँगन में

उसी के साथ खड़े हो कर

आकलन करते हैं 


बीते कल का..,

आने वाले कल के साथ ।।


***

बुधवार, 27 दिसंबर 2023

“हाइकु”

रश्मि को देख

आसमान में छिपा

भोर का तारा ।


 मोती के जैसी

धूप में चमकती

ओस की बूँद ।


श्वेत वसन

धरती ने पहने

शीत ऋतु में ।


ढलती साँझ

ठिठुरन भगाए

चाय का कप ।


धीमे से बजी

पत्तियाँ मेपल की

सर्द रात में ।

                             

सर्दी की रात

पत्तों के कम्बल में

लिपटा चाँद ।


***

गुरुवार, 21 दिसंबर 2023

“पंछी”


                      
पंछी नभ में एक अकेला 

जाने किस तलाश में धूल भरी राह में

मंजिल समीप है बस इसी अनुमान में

हवाओं के जोर में नभ के बहुत शोर में

तिनके सा उड़ चला बिसरा संगियों का रेला


रह गया नभ में अकेला 


भ्रमित सा इत-उत उड़े साथी ढूँढता फिरे

भूख और प्यास से प्राण भी संत्रास में

जाने क्यों गुरूर कर हवाओं का रुख़ भूल कर

पाला उसने ख़ुद झमेला 


हो गया नभ में  अकेला 


थक-हार टूटकर गिरा तरू की डाल पर

चारों तरफ देख कर टूटे पंख समेट कर

ग़लतियों से सीख कर मन ही मन यह प्रण किया

दोहरायेगा न जो अब झेला


पंछी तरू पर एक अकेला 

 

***

सोमवार, 27 नवंबर 2023

“क्षणिकाएँ”

“स्त्रियाँ”


अपनी उपस्थिति 

दर्ज करवाने की चाह में कि - 

“मैं भी हूँ ..”,

 उनका मौन मुखर 

होते होते रह जाता है 

और..,

अवसर मिलने तक

अभिव्यक्ति गूंगेपन का

सफ़र तय कर लेती है 

 

*


“प्रेम”

 

भग्नावशेषों और चट्टानों 

की देह पर अक्सर 

उगा दीखता है प्रेम

सोचती हूँ…,

अमरता की चाह में

 अपने ही हाथों प्रेम को

लहूलुहान..,

 कर देता है आदमी


*

शनिवार, 4 नवंबर 2023

“महक”


नींबू की पत्तियों की महक थी

 या...,

भूरी बालू  मे पड़ी  सावनी रिमझिम की

हाथ में खुरपी थामे 

वह समझ नहीं पाई


तभी एक जोड़ी निर्विकार आँखों ने 

मानो …,

मन ही मन सरगोशी की

सुनो ! 

इस पेड़ के नींबू तुम्हारे गाँव आया करेंगे 

तुम्हें बहुत पसन्द है ना..?


मन की बात पर

मन ही मन यक़ीन कर

वह आसमान की तरफ़ मुँह कर के

मुस्कुरा दी..,


सावन यूँ ही

आते-जाते रहे..,

नींबू के साथ उसकी पत्तियों का

 सौंधापन भी वैसे ही 

 महकता रहा ..,


मगर सुना है !

तब से..

 उसने अपने  खाने की थाली से

नींबू का स्वाद  हटा दिया है ।


***