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रविवार, 15 जनवरी 2017

"माँ"

दूर देश जा बैठी हो माँ!
यादों मे अब तो तुम्हारा
अक्स भी धुंधला पड़ गया है
सावन की तीज के झूले
अक्सर तुम्हारी याद दिलाते हैं
तुम्हारा और भाई का प्यार
उसी दिन तो बरसता था
मोटी रस्सी से बना झूला
पहले उसी के बोझ को
परखता था
कल ही किसी ने कहा था
मुझे "माँ"पर कुछ कहना है
माँ का प्यार, माँ के संस्कार
कुछ तो दे कर, कह कर जाती माँ.
कैसे कहूँ सब के बीच
तुम्हारी बहुत याद आती है माँ!


XXXXX

4 टिप्‍पणियां:

  1. ....बहुत मार्मिक प्रस्तुति..जीवन के कटु सत्य को बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा है..बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति जो मन को भिगो जाती है..आभार

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    उत्तर
    1. आपकी यह सराहना मेरे लिए‎ बहुत मायने रखती है संजय जी .

      हटाएं
  2. मन को सहलाता सरगम!बधाई इतनी मार्मिक रचना के लिए!एक स्नेहिल भेंट:
    http://vishwamohanuwaach.blogspot.com/2014/01/blog-post_6980.html

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी मर्म छूती प्रतिक्रिया‎ से लिए‎ बहुत बहुत‎ धन्यवाद विश्व मोहन जी .

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"