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बुधवार, 6 सितंबर 2017

“जड़ें”



(This image has been taken from google)

बे वजह ना जाने क्यों …….,
आजकल मन
बड़ा भटकता है ।
जो हो रहा है  वह भाता नही
और जो नही है
उसके कोई मायने नही ।
जड़ें चाहे पेड़ की हो
या इन्सान की कटे तो
तकलीफ ही होती है ।
और हो भी ना क्यों ………,
इनकी पकड़
जो गहरी होती है ।

xxxxx

         

10 टिप्‍पणियां:

  1. जड़े चाहे पेड़ की हों
    या इन्सान की कटे तो
    तकलीफ होती है....
    बहुत सुन्दर ,सार्थक अभिव्यक्ति....

    जवाब देंहटाएं
  2. तहेदिल से शुक्रिया सुधा जी .

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह्ह..सहज सरल मन छूती अभिव्यक्ति मीना जी।
    सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  4. तकलीफ तो होती ही है ... कुछ भी कटे ... फिर जड़ें तो बहुत ही गहेई होती हैं ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आप सही कहते है..,यही चिन्तन इस छोटी सी रचना का सृजन करवा गया आपकी हौंसला अफजाई का तहेदिल से शुक्रिया .

      हटाएं
  5. जड़ें चाहे पेड़ की हो
    या इन्सान की कटे तो
    तकलीफ ही होती है ।
    कितनी हकीक़त है आपके शब्दों में यूँ लगता है जैसे जिंदगी को शब्दों में समेट दिया हो किसी ने

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी प्रशंसा‎त्मक प्रतिक्रिया‎ सदैव और बेहतर‎ लेखन की ओर प्रेरित करती है संजय जी . बहुत बहुत धन्यवाद .

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"