तुम्हारे अपनेपन की महक सांसों में भरते ही
तन का रोम -रोम मन ही मन कह उठता है..,
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
🍁
💐🙏स्वतंत्रता दिवस की सभी विद्वजनों को हार्दिक बधाई 💐🙏
!!जय भारत!!
तुम्हारे अपनेपन की महक सांसों में भरते ही
तन का रोम -रोम मन ही मन कह उठता है..,
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
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💐🙏स्वतंत्रता दिवस की सभी विद्वजनों को हार्दिक बधाई 💐🙏
!!जय भारत!!
प्राचीन सजाये बैठा है
मेरा शहर अपने भीतर
एक गाँव बसाये बैठा है
पौ फटने से पहले ही
शुरू हो जाती है
परिंदों की सुगबुगाह
पहले बच्चों से लगावट
फिर सतर्कता भरी हिदायत
घनी शाख़ों के बीच छिपी
सुर-सम्राज्ञी जैसे ही
करती है आह्वान
निकल पड़ते हैं सारे के सारे
झुण्डों में…
लेकर नवउर्जित प्राण
अधमुंदी सी मेरी आँखों पर
जैसे कोई शीतल जल
छिड़कता है
इस शहर के सीने में
दिल नहीं एक सीधा-सादा
गाँव धड़कता है
***
शीत-घाम की राह में ,
वक़्त का पहिया चला करे ।
बन के साहस एक दूजे का ,
सदा सर्वदा साथ चले ॥
झंझावती तूफ़ानों से ,
क्यो हम भला डरा करें ।
ईश नाम की नैया से ,
मझधारों को पार करें ॥
कजरारी काली रातों में ,
तारा बन कर जीया करे ।
वेदनाओं को भूल-भाल कर ,
ख़ुशियों वाली राह चले ॥
मौन संसृति में गूंज उठे जब ,
रस आपूरित राग घनेरे ।
साथ हमारा सदा सर्वदा ,
क्यों व्यथित मन प्राण तेरे ॥
जैसे तीव्र अग्नि में तप कर ,
सोना खरा बना रहता है ।
संघर्षों की राह जीत कर ,
मानव सफल हुआ करता है ॥
***
पल !
मुझे भी चलना है
तुम्हारे साथ..
तुम से कदम मिलाकर
चल पड़ूँगी
इतना भरोसा तो है मुझे
खुद पर..
मैं तुमसे बस तुम्हारे अस्तित्व का
दशमांश चाहती हूँ
वो क्या है ना..?
तुम्हारी ही तरह
मेरे साझे भी काम बहुत हैं
चलने से पहले..
चुन लेना चाहती हूँ अपनी ख़ातिर
रेशम से भी रेशमी
रिश्तों के तार
फ़ुर्सत में उन्हें सुलझा कर
निहायत ही ..
खूबसूरत सी माला
जो गूँथनी है ।
🍁
वर्षों से
मन की अलगनी पर टंगे
चंद विचार..
भूली भटकी सोच के
धागों में
उलझे -पुलझे..
मुझसे अक्सर अपना
वितान मांगते हैं
जी ने चाहा..
आपाधापी में गुजरते
वक़्त से
कुछ लम्हें चुराऊँ
और उतार दूं इन्हें
धुंधले पड़े उपेक्षित से
कैनवास पर..
इनको भी दूं
तितलियों से उड़ने वाले
रंगीन पंख ..
मगर हमेशा मन चाहा
कहाँ होता है ?
बंधनों के आदी
कहाँ समझते हैं
पंखों वाली
चपलता-चतुरता..
पा कर स्वतंत्रता
पहली ही स्वच्छन्द उड़ान में
जा उलझते हैं..
गुलाब भरी टहनियों के
आँगन में ।
*
वर्जनाओं की
देहरी से..
कब बँध कर
रहती आई हैं
वे सब
मान मिले
तो ..
अपने आप ही
बना लेती हैं
मर्यादाओं के दायरे
बंधनों में ही ढूँढती हैं
मुक्ति..
सीमा उल्लंघन से
कब बन जाती हैं
सुनामी
पता ज़रा देर से ही
चलता है …
*
बड़ा कठिन है
‘सब ठीक है’ का
नाटक करना
अनजान होना
जान कर..
व्यथा ढकने के लिए
मुखौटे पहने
बीते जा रहा है वक़्त
दम घुटने लगा है
अब..
जी चाहता है
पूरी ताक़त से
चिल्लायें
मगर इस से होना
क्या है ..
सब की अपनी-अपनी
ढपली
अपना-अपना राग है
सच तो यही है
कि..
अपनी खामोशी भी
उन्हें अंतरंगता ही
लगती है
उलझनों के भंवर
के फेर में ..
कितने ही दिनों से
हम अपरिचितों की तरह
एक ही घर में
अलग-अलग घर बसाये
बैठे हैं …!!
*