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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

"त्रिवेणी"


(1)
मीलों लम्बी‎ बातें जब चलती हैं तो रुकती  नही ,
रील में बन्धे धागे सी खुलती ही चली जाती हैं ।

बरसों साथ जीया वक्त लम्हों में कहाँ सिमटता है ।।

                      (2)

कुछ जान-पहचान वक्त के हाथों ,
वक्त के साथ , हाथों से फिसल जाती है ।

मुट्ठी में बन्द रेत टिकती कहाँ है ।।

         XXXXX

4 टिप्‍पणियां:

  1. कहने को कुछ बचा ही नहीं एक एक नज्म दिल का कोई ना कोई तार छेडने वाली !!

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  2. आपकी हौसला अफजाई के लिए‎ तहेदिल से आभार संजय जी .

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  3. कुछ जान-पहचान वक्त के हाथों ,
    वक्त के साथ , हाथों से फिसल जाती है ।
    मुट्ठी में बन्द रेत टिकती कहाँ है ।।------ वाह !!!!!!!! अति सुंदर !!!

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"