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बुधवार, 28 मार्च 2018

“त्रिवेणी"

  (1)

अधपकी रोटी का कोर खाते उसकी आँखों‎ में नमी
और जुबां पे छप्पन भोग का स्वाद घुला है ।

बेटी के हाथों सिकी पहली रोटी मां की थाली में है ।।

                      (2)

मीठे चश्मे सी  निकलती है पहाड़ से नदी
और जीवन संवार देती है मैदानों का ।

दो कुलों को बसा दिया प्रकृति से बेटी जो ठहरी ।।

                   XXXXX

8 टिप्‍पणियां:

  1. खुबसूरत लफ़्ज़ों के साथ...मन के भाव बहुत ख़ूबसूरत ढंग से आपके शब्दों में ढल कर मुखर हो जाते हैं ।

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    1. आपकी प्रोत्साहन‎ भरी प्रतिक्रिया‎ सदैव मनोबल बढ़ाने वाली होती हैं बहुत बहुत धन्यवाद संजय जी .

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  2. बहुत ही लाजवाब ... अर्थपूर्ण और दिल को छूती हुयी दोनों त्रिवेनियाँ ...
    बेटी से जुड़ी पंक्तियाँ सीधे दिल में उतर रही हैं ...

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद नासवा जी . आपकी ऊर्जा‎वान प्रतिक्रिया‎ सदैव बेहतर लेखन‎ हेतु मार्गदर्शन करती है.

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  3. अर्थपूर्ण और प्रभावी रचना

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  4. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/04/63.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरी लिखी रचना 'त्रिवेणियाँ" को "मित्र मंडली" में लिंक कर के मान देने के लिए तहेदिल से शुक्रिया राकेश जी .

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"