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शनिवार, 30 मई 2020

"मानवता"



स्वार्थ जब हो बड़े अपने 

मानवता- चर्चा कैसे हो ।

फूटते पाँवों के छाले ।

दर्द महसूस हो तो हो ।।


कहीं पर भोर है उजली ।

 कहीं चहुंओर अंधियारा ।।

बना पत्थर हृदय माली ।

 तिनके का कौन सहारा ।।


धरती पर आग बरसती है ।

मेघों का पानी भी सूखा ।।

चले जा रहे हैं जत्थों में ।

बेबसों का मन बल है ऊँचा ।।


अरे ओ पत्थर दिल वालों ।

कभी इनकी भी सुध तो लो ।।

छोड़ कर तूं- मैं  तुम अपनी ।

कभी तो जन-सेवा कर  लो ।।


संकट से उबरे सब निर्बल ।

दायित्व निबाहो अब मन से ।।

मत फेरो अपनी आँखे तुम ।

आपदा ग्रस्त जन रक्षण से ।।

            

 🍁🍁🍁


【 चित्र - गूगल से साभार 】

32 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और सार्थक।
    पत्रकारिता दिवस की बधाई हो।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपको भी पत्रकारिता दिवस की हार्दिक बधाई सर !
      रचना सराहना हेतु बहुत बहुत आभार । सादर...,

      हटाएं
  2. यथार्थ और सामायिक दर्द , मानवता का आह्वान छिपा है रचना में ,
    बहुत सुंदर सृजन मीना जी ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. रचना आपको पसन्द आई..लेखन सफल हुआ । हृदयतल से आभार कुसुम जी ।

      हटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (३१-०५-२०२०) को शब्द-सृजन-२३ 'मानवता,इंसानीयत' (चर्चा अंक-३७१८) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. शब्द-सृजन की विशेष प्रस्तुति में रचना साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार अनीता जी ।

      हटाएं
  4. धरती पर आग बरसती है ।

    मेघ का पानी भी सूखा ।।

    चले जा रहे हैं जत्थे ।

    बेबसों का मन बल है ऊँचा ।।
    वाह!!!!
    बहुत कुछ दर्शा कर बहुत कुछ समझा दिया आपने....पर कौई माने तब न...
    लाजवाब सृजन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही कहा आपने सुधा जी ! रचना का मर्म स्पष्ट करती सुन्दर सार्थक प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार आपका ।

      हटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  6. मानवीय करुणा और मजदूरों की व्यथा का चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  7. सोई हुई संवेदना को झिंझोड़कर जगाती मार्मिक रचना। उत्कृष्ट सृजन।

    आपकी रचना पढ़कर और सड़क पर चलते दुखयारे पैदल मज़दूरों को देखकर ग्वालियर में मेरे मित्र कवि राजेश शर्मा जी के गीत की पंक्तियाँ स्मृति पटल पर उभर आईं जिन्हें उनके सुमधुर कंठ से मैंने साथ रचना पाठ करते हुए 1994 में सुनी थीं --

    "भर आए परदेशी छालों से पांव

    चलो लौट चलें,

    दुखयारे तन-मन से गीतों के गांव

    चलो लौट चलें।"

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी मर्मस्पर्शी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार आ. रविंद्र सिंह जी ।

      हटाएं
  8. संकट से उबरे सब निर्बल ।

    दायित्व निबाहो अब मन से ।।

    मत फेरो अपनी आँखे तुम ।

    आपदा ग्रस्त जन रक्षण से ।।
    बहुत सुंदर रचना, मीना दी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुन्दर सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार ज्योति बहन ।

      हटाएं
  9. सच है कई बार ऐसी चर्चाएँ बस किताबी रह जाती हैं ... उनके दर्द तक कोई पहुँच नहीं पाता ... आज के समय कोरी बातों से आगे आ कर जितना ही सके करने का समय है ... गहरी सचेत करती रचना ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सारगर्भित समीक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार नासवा जी ।

      हटाएं
  10. मीना जी,

    मानवीय करुणा और मजदूरों की व्यथा का चित्रण
    सुन्दर-सार्थक। रचना
    बधाई हो।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सारगर्भित अनमोल प्रतिक्रिया से रचना सार्थक हुई । हार्दिक आभार जोया जी ।

      हटाएं
  11. अति उत्तम मीना जी ,व्यस्तता के कारण समय पर नही पढ़ पाई ,माफी चाहती हूँ ।आपको पढ़ना अच्छा लगता है ,मुझे नई पोस्ट के बारे मे पता नही चलता ,इसी कारण टिप्पणी के माध्यम से आ जाती हूँ ,इसके लिए आप सभी रचनाकारों का तहे दिल से शुक्रियां ,

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपके स्नेहिल संदेश से अभिभूत हूँ ज्योति जी । आपका स्नेह बना रहे इस उम्मीद के साथ आपका हृदयतल से धन्यवाद 🙏🙏

      हटाएं
  12. धरती पर आग बरसती है ।

    मेघों का पानी भी सूखा ।।

    चले जा रहे हैं जत्थों में ।

    बेबसों का मन बल है ऊँचा


    vishwaas kijiye..aaj dubaara aayi is rchnaa ko pdhne

    koundh rhe the iske shbd to sochaa ik baar duhraayi kr aaun

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अभिभूत हूँ जोया जी आपकी मान भरी प्रतिक्रिया से..
      अंतस् की गहराइयों से असीम आभार।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"