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बुधवार, 16 सितंबर 2020

"चिंतन"

                          
आत्म दर्शन के लिए
समय कहाँ है हमारे पास
बाहरी आवरण को ही
जाँच-परख कर
ऐंठे फिरते हैं गुरूर में
देख भाल के अभाव में 
अन्तर्मन रहता है 
सदा ही उपेक्षित 
देह के एक कोने में
मासूम बच्चे सा
उठाता है सिर कई बार
जोर लगा कर 
तो व्यस्त भाव से 
पूरी श्रद्धा और हक  से 
दबा देते हैं 
उसकी आवाज़
जैसे..
घर आए मेहमान के 
आतेथ्य भाव में मगन हम
अपने ही घर में
अपने ही बालक को 
भूखा सोने को मजबूर करते हैं

***

24 टिप्‍पणियां:

  1. मैं बस इस पृष्ठ पर ठोकर खाई और कहना है - वाह। साइट वास्तव में अच्छी है और अद्यतित है। जारी रखें

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना के लिए बहुत बहुत आभार स्वरा मिश्रा जी 🙏

      हटाएं
  2. गजब भावों की गहन अनुभूति देता सटीक चिंतन।
    बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार कुसुम जी ।

      हटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.9.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय दिलबाग सिंह जी .

      हटाएं
  4. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 17 सितंबर 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह जी ।

      हटाएं
  5. बहुत अच्छी... विचारोत्तेजक कविता हेतु साधुवाद 💐🙏💐

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मनोबल संवर्द्धन के लिए बहुत बहुत आभार वर्षा जी🙏🙏

      हटाएं
  6. कृपया मेरी इस पोस्ट को पढ़ कर आप अपनी टिप्पणी देवें तो मुझे प्रसन्नता होगी 🙏
    https://vichar-varsha.blogspot.com/2020/09/16.html?m=1

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी मैं अवश्य आपके ब्लॉग पर उपस्थित होऊँगी 🙏🙏

      हटाएं
  7. उत्तर
    1. उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार सर .

      हटाएं
  8. उत्तर
    1. मनोबल संवर्द्धन के लिए बहुत बहुत आभार सर.

      हटाएं
  9. सराहना से परे दी आपका चिंतन बेहतरीन 👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार अनीता सस्नेह...,

      हटाएं
  10. सही कहा आत्मदर्शन के लिए समय ही नही निकालते...
    जैसे..
    घर आए मेहमान के
    आतेथ्य भाव में मगन हम
    अपने ही घर में
    अपने ही बालक को
    भूखा सोने को मजबूर करते
    वाह!!!
    अद्भुत... लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी प्रतिक्रिया सदैव लेखनी को सार्थकता प्रदान करती है .. सस्नेह आभार सुधा जी ।

      हटाएं
  11. उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार सर.

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"