पंछी नभ में एक अकेलाजाने किस तलाश में धूल भरी राह में
मंजिल समीप है बस इसी अनुमान में
हवाओं के जोर में नभ के बहुत शोर में
तिनके सा उड़ चला बिसरा संगियों का रेला
रह गया नभ में अकेला
भ्रमित सा इत-उत उड़े साथी ढूँढता फिरे
भूख और प्यास से प्राण भी संत्रास में
जाने क्यों गुरूर कर हवाओं का रुख़ भूल कर
पाला उसने ख़ुद झमेला
हो गया नभ में अकेला
थक-हार टूटकर गिरा तरू की डाल पर
चारों तरफ देख कर टूटे पंख समेट कर
ग़लतियों से सीख कर मन ही मन यह प्रण किया
दोहरायेगा न जो अब झेला
पंछी तरू पर एक अकेला
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