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मंगलवार, 3 मार्च 2015

"उड़ान"

उसे भी हक दो,वह भी उडना चाहती है,
उसकी परवाजें भी तुम्हारी तरह,
आसमान को छूना चाहती है.
क्यों अनचाहे झपट्टे से
उसके हौसले को तोडना चाहते हो?
देखो तो सही,वह कितना डर गई है.
रात भर  उसकी पनीली आँखों मे,
तुम्हारा ही खौफ तैरता रहा.
क्या जीने का हक केवल तुम्हारा ही है,
तुम्हे मालूम भी है ?
कल से उसने ना चुग्गा खाया,
ना पानी पिया.
अब तो भोर हो गई है
अब तो बीती बातें बिसार दो.
उसको आवाज दो,हौंसला दो,
वह भी तुम्हारी तरह स्वछन्द होकर,
असीम और अनन्त आसमान की
ऊचाईयों को छूना चाहती है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. ......बहुत खूब लिखते रहिये :)
    उड़ जाना चाहता हूँ मैं
    खोल के बाहें अपनी
    थामना चाहता हूँ मैं
    सारे आसमान को,
    मैं बस उड़ना चाहता हूँ
    मत रोको अब
    मुझ मतवाले को,
    मैं जीना चाहता हूँ !

    जवाब देंहटाएं
  2. Thank you so much Sanjay ji for your motivational comment through your beautiful poem.

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"