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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

“खामोशी”

तुम्हारी खामोशी...,
जैसे बिन मौसम की बरसात
जब मन किया...,
बस यूं ही पसर जाती है
हवाओं का दवाब कुछ कम सा है
निर्वात का आभास कहता है
आँधी या तूफान आने वाला है
तुम्हारी खामोशी भी कुछ-कुछ वैसी ही है
बताओ ना कौन सा गुल खिलाने वाले हो ?

2 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"