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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

“सच"

सुना था कभी
साहित्य समाज का दर्पण होता है
अक्स सुन्दर हो तो
गुरुर बढ़ जाता है
ना हो तो
नुक्स बेचारा दर्पण झेलता है
सोच परिपक्वता मांगती है
आईना तो वही दर्शाता है
जो देखता है
झेला भोगा अनुभव कहता है
उमस और घुटन का कारण
हमारी सोचों के बन्द दरवाजे हैं
हवाएँ ताजी और सुकून भरी ही होंगी
दरवाजे और खिड़कियाँ खोलने की जरुरत भर है
हम से समाज हम से प्रतिबिम्ब
तो दोष के लिए ऊँँगली का इशारा
किसी एक की तरफ ही क्यों है ।।


XXXXX

2 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"