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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

"बोन्साई"

एक मुद्दत पहले गीली माटी में
घुटनों के बल बैठ कर
टूटी सीपियों और शंखों के बीच
अपनी तर्जनी के पोर से
मैंंने तुम्हारा नाम लिखा था ।

यकबयक मन में एक दिन
अपनी नादानी देखने की
हसरत सी जागी तो पाया

भूरी सूखी सैकत के बीच
ईंट-पत्थरों का जंगल खड़ा था
और जहाँ बैठ कर कभी
मैंंने तुम्हारा नाम लिखा था वहाँ
मनमोहक सा एक
बोन्साई का पेड़ खड़ा था ।।


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- "मीना भारद्वाज"