Followers

Copyright

Copyright © 2020 "मंथन"(https://shubhrvastravita.blogspot.in/) .All rights reserved.

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

"बोन्साई"

एक मुद्दत पहले गीली माटी में
घुटनों के बल बैठ कर
टूटी सीपियों और शंखों के बीच
अपनी तर्जनी के पोर से
मैंंने तुम्हारा नाम लिखा था

यकबयक मन में एक दिन
अपनी नादानी देखने की
हसरत सी जागी तो पाया

भूरी सूखी सैकत के बीच
ईंट-पत्थरों का जंगल खड़ा था
और जहाँ बैठ कर कभी
मैंंने तुम्हारा नाम लिखा था वहाँ
मनमोहक सा एक
बोन्साई का पेड़ खड़ा था ।।


XXXXX

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"