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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

"अजनबी"

बड़े अजनबी होते हैं शहर
हाथ बढ़ा‎ओ तो भी
दोस्ती नही करते बस
अपनी ही झोंक में रहते हैं

गाँव के तो पनघट भी बोलते हैं
कभी कनखियों से
तो कभी मुस्कुरा  के
फुर्सत हो तो हवा के झोकों संग
कभी कभी हाल-चाल भी
पूछ लिया करते हैं

शहरों की बात ही अलग है
अपनी ही धुन में भागे जाते हैं
और तो और…..,
जिस लिफ्ट से हजार बार गुजरो
अजनबी ही रहती है कुछ इमरजेन्सी नम्बरों और
बटनों के साथ बस घूरती .....,
एक खट् की आवाज मानो कह रही हो---
“अब उतर भी जाओ ।”

        XXXXX

22 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही शहरी संस्कृति और कंक्रीट बोते इंसान अब भागती दौड़ती ज़िंदगी की सहूलियत में खुद भी रोबोट में ही तब्दील होते जा रहे है।
    विचारणीय सुंदर रचना मीना जी।

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  2. रचना सराहना के लिए‎ तहेदिल से शुक्रिया श्वेता जी.

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  3. बहुत‎ बहुत‎ धन्यवाद ज्योति जी.

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  4. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १९ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    विशेष : आज 'सोमवार' १९ फरवरी २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच ऐसे एक व्यक्तित्व से आपका परिचय करवाने जा रहा है। जो एक साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य सुधा' के संपादक व स्वयं भी एक सशक्त लेखक के रूप में कई कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। वर्तमान में अपनी पत्रिका 'साहित्य सुधा' के माध्यम से नवोदित लेखकों को एक उचित मंच प्रदान करने हेतु प्रतिबद्ध हैं। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य"

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    1. बहुत बहुत आभार "लोकतंत्र" संवाद में मेरी रचना "अजनबी" को सम्मिलित करने के लिए ध्रुव सिंह जी.

      हटाएं
  5. बहुत सुन्दर मीना जी. आपने हम सबकी दुखती रग छेड़ दी. गाँव, कस्बे और छोटे शहरों के लोग ही नहीं, दरो-दीवार भी हमसे बोल लेती हैं और इन महानगरों में तो अपना साया भी अजनबी, अपना पड़ौसी भी अजनबी ! और तो और, हम ख़ुद से भी अजनबी होते जाते हैं.

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    उत्तर
    1. आप जैसे गुणीजन को मेरी रचना पसन्द आई. मेरा लिखना सफल हुआ. बहुत बहुत आभार आपका.

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/02/57.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना "अजनबी" को "मित्र मंडली" में लिंक करने के लिए अत्यन्त आभार राकेश जी.

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  7. वाह!! क्या सही लिखा है! उम्दा बयानी!!!

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  8. सत्य को दर्शाती रचना..

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  9. वाह ! क्या बात है ! बिलकुल सत्य ! बहुत खूब आदरणीया ।

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  10. ये शहर पत्थर के होते हैं जी न साँस लेते हैं ... संगीत नहि होता बस खट खट होती है मशीन की ... गाँव के सांसें शहर आते आते रुक जाती हैं ... गहरी रचना ...

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  11. सही कहा आपने....,रहती शहर में ही हूँ लेकिन ना जाने क्यों राजस्थान के उस छोटे से कस्बे को भूल नही पाती जो जन्मस्थली होने के साथ कभी मेरी कर्मस्थली भी था. मेरी रचना पर अपने विचार रखने के लिए तहेदिल से शुक्रिया.

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  12. बहुत गहराई में जाकर आपने ये प्रश्न रखा है !!

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  13. बहुत बहुत धन्यवाद संजय जी .

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“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"