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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

"ताँका"

"पतझड़”

व पल्लव
विकसे तरु शाख
जीर्ण से पात
झरे विटप गात
पतझड़ के बाद

  किसान”

मुँह अँधेरे
किसान चल दिया
खेतो की ओर
जी तोड़ मेहनत
नतीजा मुट्ठी भर
   
xxxxxxx
   

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्ह्ह....अति सराहनीय प्रयास मीना जी और आभार भी आपका नयी विधा में मेरी उत्सुकता जगाने के लिए।
    हम भी जरुर प्रयास करेंगे:)

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/02/56.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह ...
    ताकाँ का सफल प्रयास ... अच्छे लगे ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हौसलाअफजाई के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

      हटाएं
  4. जीर्ण से पात
    पतझड़ के बाद
    बढ़िया ताकाँ अच्छा प्रयास ... मैं काम जानता हूँ ताँके के बारे पर पढ़ने की उत्सुकता बानी रहती है मीना जी

    जवाब देंहटाएं
  5. चाहे कविता हो या लेख...,समसामयिक विषयों पर आपकी पकड़ बड़ी गहरी होती है. दूसरे लेखकों की लेखन शैली का सराहना आपकी सहृदयता और लेखन के प्रति सम्मान भाव है .बहुत बहुत धन्यवाद आपका रचना सराहना के लिए संजय जी .

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"