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मंगलवार, 29 जनवरी 2019

"विश्वास"

अक्सर कुछ अनसुलझे
प्रश्न मन के दरिया में
कभी रोष तो कभी
असन्तोष का व्यूह बन
भंवर से घुमड़ते हैं ।
उस वक्त लगता है …,
अब की बार बह निकलेंगे
अल्फाज़ों में बिखर
लावा या सुनामी से… ,
मगर ये जो पुल है ना जिसका
ईंट-गारा और पत्थर….,
नेह की बुनियाद है ।
अटल खड़ा है हिमालय सा
रोक लेता है हर आवेग को ।
गहरी खामोशी के बाद …,
मन के किसी कोने से
एक आवाज उभरती है….,
ये हिमालय यूं ही खड़ा रहे ।
अडिग…,अटल ….., निश्चल…,
इस कायनात से उस कायनात तक ।।
XXXXX

28 टिप्‍पणियां:

  1. गहरे भावो से भरी रचना
    बेहतरीन .........आदरणीया

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  2. बहुत सुन्दर रचना सखी
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी लिखी रचना "मुखरित मौन में" शनिवार 02 फरवरी 2019 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. "मुखरित मौन"में मेरी रचना को साझा करने के लिए सादर आभार यशोदा जी ।

      हटाएं
  4. कई बार लगता है अनसुलझे सवालों का निकल जाना अच्छा ... पर अगर जवाब ना मिला तो ... ये फूट जाएँगे लावा बन के ... अच्छा है अंदर ही शांत हो जाएँ ...
    अच्छी रचना ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी लेखनी को संबल प्रदान करती सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार आभार नासवा जी ।

      हटाएं
  5. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भारत में "हरित क्रांति के पिता" - चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. ब्लॉग बुलेटिन के इस निमन्त्रण के लिए सादर आभार हर्षवर्धन जी ।

      हटाएं
  6. सुन्दर कृति। कभी कभी प्रश्नों का बहार आना भी जरूरी होता है।

    जवाब देंहटाएं
  7. आभार विकास जी ! ऐसा topicअब की बार ख्याल मेंं आया तो आपकी राय पर काम करने प्रयास होगा ।

    जवाब देंहटाएं
  8. इन अनसुलझे प्रश्नों से उपजा रोश और असन्तोष बड़ा घातक होता है...लावा सा पिघलकर बाहर आया तो नेह का पुल ढह जाने का खतरा और अन्दर ही हिमालय सा अडिग देखने में अटल भी...परन्तु तन मन पर लम्बी बीमारी देता है...
    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण सृजन....

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    उत्तर
    1. आपके कथन से पूर्णतया सहमत । आपकी हौसला अफजाई
      से अभिभूत हूँ सुधा जी ।

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  9. 'हिम्मते मीना, मदद-ए-ख़ुदा.'

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 🙏😊

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  10. अंतर्मन की उमड़ घुमड़ का मनोवैज्ञानिक आख्यान. बहुत सुन्दर मीना जी, बधाई और आभार!!!

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    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया से रचना को सार्थकता मिली , तहेदिल से आभार विश्वमोहन जी ।

      हटाएं
  11. उत्तर
    1. हृदयतल से आभार अनुराधा जी,आपकी प्रतिक्रिया सदैव संबल देती है ।

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  12. बहुत खूब.....बेहतरीन रचना आदरणीया

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    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन के लिए तहेदिल से आभार रविंद्र जी ।

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  13. उत्तर
    1. रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार राकेश जी !

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  14. गहरी खामोशी के बाद...मन के किसी कोने से एक आवाज उभरती है...कई दिन कई शाम यूँ ही गुजर जाती है
    सन्नाटा भी खुद से बेखबर कहीं और चला जाता है....बहुत अच्छी रचना मीना जी.....प्रत्येक अक्षर गहराई लिए...!!

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    उत्तर
    1. आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया सदैव उत्साहवर्धन करती संजय जी । तहेदिल से आभार !

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"