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सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

“औरत”

रात कब की हो गई ।
थक गई वह सो गई ।।

जागती रहती सदा ।
थकन हावी हो गई ।।

चन्द्रमा की चाँदनी ।
ओढ़नी सी हो गई ।।

छोड़ बाबुल आंगना ।
भूल अपने को गई ।।

नेह का सागर बनी ।
आप खारी हो गई ।।

ओस की सी बूँद वह ।
धूप में आ खो गई ।।

भागती रहती सदा ।
सांस सब की हो गई।।


✍  ------   --------✍

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ...
    सच में ओरत का जीवन चक्री की तरह घूमता रहता है ...
    बहुत ही सहज पल उठा कर इस छोटी बहर में बाँधा है ओरत के जीवन को ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस गजल पर आपकी प्रतिक्रिया...., सफल हो गया लिखना । बहुत बहुत आभार नासवा जी !

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व कैंसर दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    उत्तर
    1. ब्लॉग बुलेटिन में मेरी रचना को मान देने के लिए तहेदिल से आभार हर्षवर्धन जी ।

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  3. नारी शक्ति को प्रणाम। मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

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    उत्तर
    1. सादर नमस्कार नीतीश जी ! स्वागत आपका "मंथन" पर ।
      आपके निमन्त्रण का शुक्रिया तहेदिल से ।

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  4. बहुत सुन्दर सखी
    लाजबाब सृजन नारी जीवन का
    सादर

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    उत्तर
    1. सहृदय आभार प्रिय अनीता हौसलाअफजाई के लिए ।

      हटाएं
  5. रिश्तों में ही समाई है उसकी जान
    कहते हैं लोग औरत है महान...
    नारी’। इस शब्द में इतनी ऊर्जा है, कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है... औरत का जीवन त्याग भरा होता है बेहद मर्मस्पर्शी और सराहनीय प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित एवं सराहनीय प्रतिक्रिया से रचना को सार्थकता मिली । बहुत बहुत आभार संजय जी !

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2019/02/108.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. "मित्र मंडली" के संकलन मेंं मेरी रचना को मान देने के लिए हृदयतल से आभार राकेश जी ।

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  7. नेह का सागर बनी ।आप खारी हो गई ।
    बहुत खूब.... मीना जी

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"