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गुरुवार, 2 मई 2019

"त्रिवेणी"

 ( 1 )

गर्म अहसास पूरी शिद्दत से मौजूद है
कल कल करते निर्झर कब के सूख गए

ग्लेशियर तो पहले ही कोहिनूर जैसे हैं

( 2 )

ख्वाब की तरह आ बसते हो आँखों में
भोर के साथ स्मृतियाँ भी धुंधला जाती हैं

बस…,आँखों की चुभन तुम्हारा अहसास जताती हैं

( 3 )

एक जैसी ही है संरचना मन और प्याज की
गाँठ के एक बन्धन में मजबूती से बंधी

आवरण टूटा नहीं कि खुलती जाती हैं परत दर परत

              xxxxx

30 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 04 मई 2019 को साझा की गई है......... मुखरित मौन पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. "मुखरित मौन" के 4 मई के निमन्त्रण और मेरे सृजन को साझा करने के लिए हृदयतल से आभार यशोदा जी ।

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  3. एक जैसी ही है संरचना मन और प्याज की
    गाँठ के एक बन्धन में मजबूती से बंधी

    आवरण टूटा नहीं कि खुलती जाती हैं परत दर परत
    बहुत ही सुंदर बात कही हैं आपने मीना जी ,सादर नमस्कार

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    1. आपकी स्नेहिल उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभारी हूँ कामिनी जी ।

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  4. त्रिवेणी शैली में लिखी तीनों त्रिवेणी रचनाएं लाजवाब मीना जी।। त्रिवेणी विधा पर खरी उतरती, भाव स्पष्ट करती
    अप्रतिम त्रिवेणियां।

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    उत्तर
    1. त्रिवेणियाँ लिखते समय हमेशा ही conscious हो जाती हूँ आपका उत्साहवर्धन बहुत मायने रखता है । स्नेहिल आभार कुसुम जी ।

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  5. सुन्दर शैली में लिखी सुन्दर रचनाएँ।

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    उत्तर
    1. हृदयतल से आभार इस अनमोल प्रतिक्रिया के विकास जी ।

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  6. बेहतरीन त्रिवेणी तीनों लाजबाब
    सादर

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    उत्तर
    1. स्नेहिल आभार सुन्दर सी प्रतिक्रिया के लिए अनीता जी ।

      हटाएं
  7. लाजवाब त्रिवेणी....
    वाह!!!

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  8. उत्तर
    1. हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार विश्वमोहन जी ।

      हटाएं
  9. सुन्दर त्रिवेणी.......चंद लव्जों में ब्यान करते इस सम्वेदंशील्यता को कितने कम शब्दों में लिख दिया मीना जी

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    उत्तर
    1. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली संजय जी ! हृदयतल से आभार आपका ।

      हटाएं
  10. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (04-05-2019) को "सुनो बटोही " (चर्चा अंक-3325) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    ....
    अनीता सैनी

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    उत्तर
    1. "चर्चा मंच" में मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए हृदयतल से स्नेहिल आभार अनीता जी ।

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  11. गर्म अहसास पूरी शिद्दत से मौजूद है
    कल कल करते निर्झर कब के सूख गए

    ग्लेशियर तो पहले ही कोहिनूर जैसे हैं
    ... ये पंक्तियाँ तो बहुत ही खूब कहीं आपने !!!
    बहुत सुंदर रचना

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    उत्तर
    1. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से रचना को सार्थकता मिली मीना जी । हार्दिक आभार ।

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  12. उत्तर
    1. बेहद अच्छा लगा आपकी अनमोल प्रतिक्रिया पा कर । स्वागत आपका ।

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  13. एक जैसी ही है संरचना मन और प्याज की
    गाँठ के एक बन्धन में मजबूती से बंधी

    आवरण टूटा नहीं कि खुलती जाती हैं परत दर परत
    बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात कहीं हैं आपने, मीना दी।

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    उत्तर
    1. हौसला अफजाई के लिए स्नेहिल आभार ज्योति जी ।

      हटाएं
  14. एक जैसी ही है संरचना मन और प्याज की
    गाँठ के एक बन्धन में मजबूती से बंधी
    आवरण टूटा नहीं कि खुलती जाती हैं परत दर परत!!!!!!!!!
    बहुत खूब प्रतीकात्मक रचना प्रिय मीना जी |प्याज और मन का एक जैसा होना सचमुच बहुत ही सटीक विश्लेषण है | दोनों की परत दर परत अपने अन्दर एक अनूठा रहस्य समेटे होते हैं | सस्नेह --

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्नेहिल आभार प्रिय रेणु जी । आपकी प्रतिक्रिया रचनाओं को मुखरता देने के साथ साथ अपनत्व से लबरेज होती हैं निशब्द और अभिभूत होता है मन आपकी उपस्थिति पाकर । सस्नेह ...,

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"