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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

"ठौर"

 
तिनका तिनका जोड़ 
तरु शाखाओं के बीच
बड़े जतन से उन्होंने
बनाया अपना घर

सांझ ढलते ही पखेरू
अपना घर ढूंढ़ते हैं
 यान्त्रिक मशीन ने
कर दी उनकी बस्ती नष्ट
टूटे पेड़ों को देख कर
विहग दुखित हो सोचते हैं

उनके घर की नींव पर
बहुमंजिल भवन बनेंगे
हर शाख घरों से पटी होगी
कंक्रीट के जंगल में
हर जगह मनु के घर होंगे

विकलता पर कर नियन्त्रण
पंछी दल चिन्तन करता है
सामर्थ्य हीन मानव
अपने दम पर कब पलता है
हम ढूंढे ठौर कोई
यह वही कदम धरता है 

सामर्थ्य सबल है अपना
हम और कहीं रह लेंगे
रहने दो इसे यहीं पर
हम नई ठौर कर लेंगे

★★★★★














               





                 














26 टिप्‍पणियां:

  1. सामर्थ्य सबल है अपना
    हम और कहीं रह लेंगे
    रहने दो इसे यहीं पर
    हम नई ठौर कर लेंगे...

    हृदय में वैमनस्य का भाव न रखने का बोध कराती सार्थक रचना..
    सच तो यह है कि इस नश्वर जगत में कुछ भी किसी का नहीं है,
    वह कहा गया है न चिड़िया रैन बसेरा..।

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    उत्तर
    1. आपकी सारगर्भित हौसलाअफजाई करती और रचना को सार्थकता देती प्रतिक्रिया के लिए हृदय से असीम आभार ।

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  2. सच दी मनुष्य की आँखों में स्वार्थपरता की पट्टी बँधी है पर एक पक्षी को भी अपना धर्म पता।
    कितना सुंदर संदेश छिपा है मरती इंसानियत के बीच लोककल्याणकारी भाव।
    बहुत अच्छी रचना।

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    उत्तर
    1. सराहना भरी सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए स्नेहिल आभार श्वेता ।

      हटाएं
  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में शुक्रवार 20 सितंबर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. "पांच लिंकों का आनन्द" में रचना को साझा करने के बहुत बहुत आभार रविंद्र जी

      हटाएं
  4. सामर्थ्य सबल है अपना
    हम और कहीं रह लेंगे
    रहने दो इसे यहीं पर
    हम नई ठौर कर लेंगे


    :)

    khud ki kaabiliyat ka ehsaas hona bahut zaruri he.....aur kabiliyat hona bhi

    bahut hi achaa rchnaa meena ji

    bdhaayi swikaaresarthak rchnaa ke liye

    जवाब देंहटाएं
  5. सामर्थ्य सबल है अपना
    हम और कहीं रह लेंगे
    रहने दो इसे यहीं पर
    हम नई ठौर कर लेंगे
    निर्बल असहाय और कर भी क्या सकते हैं
    सामर्थ्य और सबलता जब विध्वंस पर उतर आये
    बहुत ही लाजवाब सटीक सार्थक सृजन...
    वाह!!!

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    उत्तर
    1. आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के सस्नेह आभार सुधा जी ।

      हटाएं
  6. " सामर्थ्य हीन मानव "
    पखेरू का ये सोचना कि हम ही तो इनको ढूंढ़कर देते हैं रहने लायक जगह.. बेहद ही सटीक बात है ये.
    शानदार रचना.

    पधारें- अंदाजे-बयाँ कोई और

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    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए असीम आभार रोहित जी ।

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  7. उत्तर
    1. हौसला अफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया पम्मी जी ।

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  8. सामर्थ्य हीन मानव समझता कहाँ है । प्रभावी सृजन ।

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    उत्तर
    1. आपका स्वागत 'मंथन' पर 🙏..आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखन सफल हुआ । सादर..

      हटाएं
  9. सबसे सबल कहा जाने वाला मानव कितना निर्बल और स्वार्थी हैं ये आपने बहुत सुंदरता से बतलाया आपने मीना जी ,नित पेड़ों को काट अपने स्वार्थ का समान बनाता है मानव और निर्बल कहलाने वाले पंछी अपना नया बसेरा ढूंढ़ते हैं,नया नीड़ बनाते हैं ।
    बहुत सार्थक अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सारगर्भित और रचना को प्रवाह देती आपकी सुन्दर सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए सस्नेह आभार कुसुम जी ।

      हटाएं
  10. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-09-2019) को " इक मुठ्ठी उजाला "(चर्चा अंक- 3465) पर भी होगी।


    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  11. चर्चा मंच पर मेरी रचना को मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

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  12. पंच्छी क्या चाहे ...
    जीवन उमंग से भरे रहते हैं वे ... फिर चाहे आशियाना उजड़ जाए तो क्या फर्क पढता है ... बहुत लाजवाब रचना है ...

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    उत्तर
    1. आपकी उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ.. बहुत बहुत आभार नासवा जी ।

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"