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शनिवार, 1 अगस्त 2026

“संवाद“

झील-सा धीर-गंभीर
 दिखने में निश्चल 

लेकिन…,
 भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित 

मन का आँगन भी
बड़ा  विचित्र है 

सागर के ज्वार-सा
अपनी ही निस्तब्धता से
बार-बार संवाद करता है 


***



16 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार जितेन्द्र जी !

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  2. मन का ऑंगन तो सचमुच बहुत अनूठा है।
    गहन भाव लिए,कम शब्दों में संपूर्ण सार व्यक्त करती सुंदर अभिव्यक्ति दी।
    सादर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ४ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    उत्तर
    1. स्नेहिल नमस्कार सहित हार्दिक आभार श्वेता जी ! पांच लिंकों का आनन्द में ‘संवाद’ को सम्मिलित करने के लिए असीम आभार ।

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  3. सचमुच मन का आँगन बड़ा विचित्र है।
    चिंतनपरक एवं लाजवाब सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्नेहिल नमस्कार सहित हार्दिक आभार सुधा जी !

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  4. मन के आँगन को कौन समझ पाया भला
    सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार वर्मा जी !

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  5. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार सर !

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  6. उत्तर
    1. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार हरीश जी !

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  7. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार मनोज जी !

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  8. जब मन का आँगन इतना अनूठा है तो भला घर कितना सुंदर होगा, तभी तो कहते हैं- चल ख़ुसरो घर आपने

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    उत्तर
    1. सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार एवं स्वागत अनीता जी !

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"