ताकती परवाज़े भरती
चील को..
बोझिल,तन्द्रिल दृग पटल मूंद
लेटकर…,
धूप खाती रजाईयों पर
शून्य की गहराईयों में
उतरना चाहती हूँ
लिख छोड़ी है
एक पाती तुम्हारे नाम
पढ़ ही लोगे
मेरे मन की बात
जे़हन में ताजा है मेरी
कितनी याद..
तुम्हारी आँखों में
उस बेलिखी इब़ारत को
देखना चाहती हूँ
ख़फा हूँ खुद से ही
ना जाने क्यों..
नाराजगी की वजह
कुछ तो रही होगी
फुर्सत मिलेगी तो
वहीं 'वजह'
ढूंढना चाहती हूँ
***
【चित्र :- गूगल से साभार】

