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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

“हकीकत”

एक मुट्ठी ख्वाबों की
सहेजी एक आइने की तरह
जरा सी छुअन,
और... 
छन्न से टूटने की आवाज
घायल मुट्ठी,
कांच की किर्चों के साथ 
सहम सी गई।
एक गठरी यादों के
रेशमी धागों सी 
रिश्तों की डोर
अनायास ही उलझ सी गयी
कितना ही संभालो हाथों को
किर्चें चुभ ही जाती हैं।
सहेजो लाख
रेशमी धागों को
डोर उलझ ही जाती है।।


XXXXX

14 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(०१-०८-२०२१) को
    'गोष्ठी '(चर्चा अंक-४१४३)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चर्चा मंच की 'गोष्ठी'चर्चा में सृजन शामिल करने हेतु हार्दिक आभार कुसुम जी।

      हटाएं
  2. बिल्कुल सही कहा आपने कितना भी सहेजो रिश्ते की डोर उलझ ही जाती है!
    सुंदर अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार मनीषा जी।

      हटाएं
  3. सही कहा सुलझाते सुलझाते भी जब उलझती है रिश्तों की डोर तो आवाजे मन को चुभने के साथ दिल को भी घायल कर देती है।
    बहुत सुन्दर।
    लाजवाब सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता प्रदान की सुधा जी! हृदय से असीम आभार ।

      हटाएं
  4. बेहद सुंदर और जीवंत रचना दी।
    जीवन में रिश्तों का गणित समझना आसान नहीं
    विषमताओं की माला में हर किसी का अपना आसमां नहीं।
    प्रणाम
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन के मर्म को सार्थक करती सारगर्भित प्रतिक्रिया के
      लिए हृदय से असीम आभार श्वेता जी!

      हटाएं
  5. हाँ! ऐसा ही तो होता है । अति सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी स्नेहिल उपस्थिति ने सृजन का मान बढ़ाया । हार्दिक आभार अमृता जी!

      हटाएं
  6. मन को छुती मार्मिक अभिव्यक्ति।
    आपके सृजन में जीवन डग भरता हुआ दिखता है।

    जरा सी छुअन,
    और...
    छन्न से टूटने की आवाज
    घायल मुट्ठी,
    कांच की किर्चों के साथ
    सहम सी गई...आह!
    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन के मर्म को सार्थक करती सारगर्भित प्रतिक्रिया के
      लिए हृदय से असीम आभार अनीता जी!

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"