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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

“हकीकत”

एक मुट्ठी ख्वाबों की
सहेजी एक आइने की तरह
जरा सी छुअन, छन्न से टूटने की आवाज
घायल मुट्ठी, कांच की किर्चों के साथ सहम सी गई।
एक गठरी यादों की
रेशमी धागों सी रिश्तों की डोर
अनायास ही उलझ सी गयी
कितना ही संभालो हाथों को
किर्चें चुभ ही जाती हैं।
सहेजो लाख रेशमी धागों को
डोर उलझ ही जाती है।।


XXXXX

2 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"