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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

“यूं ही”

बिना बताए,चुपचाप चले आना ।
दबे पाँवों आके,यूं ही चौंकाना ।।

नासमझी सी बातें,इशारों में समझाना ।
किताबों में बेतरतीब से,ख़तों को छुपाना ।।

उजली चाँदनी रातें,तारों संग बिताना।
बेगानों की महफिल में, बेवजह मुसकुराना ।।

बेमतलब बेमकसद,झूठी-मूठी बातें बनाना‎ ।
कहाँ सीखा यूं ही,बेकदरों से दिल लगाना ।।

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- "मीना भारद्वाज"