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सोमवार, 12 जून 2017

"गिरह"

बाँटना तो बहुत कुछ था
तुमसे...
एक अँजुरी खुशियाँ‎
और...
जिन्दगी भर का नमक‎ ।
बाँटना तो बचपन भी था
जो भागते-दौड़ते
ना जाने कब का
पीछे रह गया ।
मन की चरखी पर
मोह के धागों के बीच
ना जाने तुमने
कितनी गिरहें बुन ली ।
जब भी खोलना चाहूँ
ये उलझी सी लगती हैं
खोलने को पकड़ूंं एक
तो दूसरी जकड़ी सी लगती है ।
उलझनों का ढेर है जीवन
फंदों सा कसता रहता है ।
मन करे जतन कितना
बेमतलब जकड़ा फिरता है ।
xxxxx

2 टिप्‍पणियां:

  1. कविता बहुत अच्छी लगी.... मैं बाहर था ना ...इसलिए आपकी पिछली पोस्टों पर नहीं आ पाया....

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  2. आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया‎ मेरे लिए अनमोल है संजय जी .मेेरे ब्लॉग को समय देने के लिए आपका हार्दिक आभार.

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"