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गुरुवार, 27 सितंबर 2018

"वक्त"

वक्त मिला है आज , कुछ अपना ढूंढते हैं ।
करें खुद से खुद ही बात , अपना हाल पूछते  हैं ।।

कतरा कतरा वक्त , लम्हों  सा बिखर गया ।
फुर्सत में खाली हाथ , उसे पाने को जूझते हैं ।।

दौड़ती सी जिंदगी , यकबयक थम गई ।
थके हुए से कदम , खुद के निशां ढूंढते हैं ।।

गर्द सी जमी है ,  घर के दर और दीवारों पर  ।
मेरे ही मुझ से गैर बन , मेरा नाम पूछते हैं ।।

ज़िन्दगी की राह में , देखने को मिला अक्सर ।
दोस्त ही दुश्मन बन  , दिल का चैन लूटते हैं ।।

XXXXX

16 टिप्‍पणियां:


  1. गर्द सी जमी है , घर के दर और दीवारों पर ।
    मेरे ही मुझ से गैर बन , मेरा नाम पूछते हैं ।।
    बहुत सुंदर रचना मीना जी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाहः बहुत उम्दा
    बेहतरीन रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. ज़िन्दगी की राह में , देखने को मिला अक्सर ।
    दोस्त ही दुश्मन बन , दिल का चैन लूटते हैं ।।
    वाह !!!
    क्या बात है!!!
    बेहद सुन्दर ...लाजवाब...

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत बहुत आभार सुधा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह वाह
    कमाल की रचना है.
    मशगुल है अपने आप में सब
    घर में कौन मुझे पहचाने है अब. रंगसाज़

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हौंसला अफजाई करती सुन्दर सी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार रोहिताश्व जी ।

      हटाएं
  6. मेरे ही मुझ से गैर बन , मेरा नाम पूछते हैं ।।......वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार विश्व मोहन जी।

      हटाएं
  7. ज़िन्दगी की राह में देखने को मिला अक्सर ।
    दोस्त ही दुश्मन बन दिल का चैन लूटते हैं ।।
    ..........बेहतरीन पंक्तियाँ रची हैं मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. ऊर्जात्मक मनोबल संवर्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार संजय जी :-)

      हटाएं
  8. सही कहा है ...
    दोस्त बन कर ही कुछ लोग लूटते हैं ... वार करते हैं ...
    बहुत ही अच्छे शेर हैं ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हौसला अफजाई के लिए हृदयतल से आभार नासवा जी ।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"