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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

"उलझन"

अपनी कुछ ना कहता है मन ।
खुद में  डूबा रहता है  मन ।।

खामोशी की मजबूरी क्या  ?
मुझसे कुछ ना कहता है मन ।।

शोर मचाती इस दुनिया में ।
चुप्पी से सब सहता है मन ।।

इठलाती चंचल नदिया की ।
धारा बन कर बहता है मन ।।

समझाने से कुछ ना समझे ।
खुद की धुन में रहता है  मन ।।


                  XXXXX

12 टिप्‍पणियां:

  1. मन, एक तिलिस्म रचता है। कौन जाने ये कहा करता और कहता है।

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  2. समझाने से कुछ ना समझे ।
    खुद की धुन में रहता है मन
    ........गजब कि पंक्तियाँ हैं !!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहनीय प्रतिक्रिया सदैव बेहतर सृजन हेतु प्रेरित करती है संजय जी ।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"