Copyright

Copyright © 2026 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

“पीड़ा”

मन की पीड़ा
बह जाने दो  ।
बहते दरिया में वो
हल्की हो जाएगी ।
गीली लकड़ी‎ समान
होती है  मन की पीड़ा ।
जब उठती है तो
सुलगती सी लगती है  ।
और आँखों में धुएँ के साथ
सांसों में जलन सी भरती है ।
पता है ……. ?
ठहरे पानी पर
काई ही जमती है ।
थमने से वजूद  
खो सा जाता है  ।
चलते रहो …..,
यही‎ जिन्दगी है ।

xxxxx

शनिवार, 16 सितंबर 2017

“त्रिवेणी"


                  (1)

पछुआ पुरूवाई संग सौंधी सी महक है
कहीं  पहली बारिश  की बूँद गिरी होगी ।

माँ के हाथ की सिकती रोटी  यूं ही महका करती थी ।।

                   (2)
 
ढलती  सांझ  और नीड़ में लौटते परिन्दे
सूरज संग मन भी डूबता जाता है ।

ईंट पत्थरों से बने हो वर्ना हिचकी जरूर आती ।।

                xxxxx

रविवार, 10 सितंबर 2017

“त्रिवेणी"

(This image has been taken from google)
( 1 )

प्रकृति में रूक्षता और कठोरता दिखती है
ओस कण तो मृदुल और तरल होते हैं ।

लगता है कभी‎ अपनापा बड़ा गहरा रहा होगा ।।

( 2 )

ताल के सोये पानी को कंकड़ी मार
शरारती बच्चे ने गहरी नीन्द से जगा दिया ।

तुम  से मिल के भी  बस यूं ही हलचल हो जाती है।।

( 3 )

बहुत सारे  फूल  हवाओं के झकोरों संग
झुण्ड के झुण्ड शाखों को छोड़ कर चल दिए ।
शायद अस्तित्व‎ की तलाश में ।।

xxxxx

बुधवार, 6 सितंबर 2017

“जड़ें”



(This image has been taken from google)

बे वजह ना जाने क्यों …….,
आजकल मन
बड़ा भटकता है ।
जो हो रहा है  वह भाता नही
और जो नही है
उसके कोई मायने नही ।
जड़ें चाहे पेड़ की हो
या इन्सान की कटे तो
तकलीफ ही होती है ।
और हो भी ना क्यों ………,
इनकी पकड़
जो गहरी होती है ।

xxxxx

         

शनिवार, 2 सितंबर 2017

“वादा”

एक वादा था तुमसे
जो खेल खेल में कर दिया
जमीं पे तारे और 
पूनम के चाँद का ।
काम जरा मुश्किल सा था
मगर बात भी जिद्द की  थी 
गुलमोहर के नीचे स्याह रात में
 बड़े जतन से मुट्ठी भर 
जुगनू लाकर छोड़े हैं ।
तारों की  चमक तो आ गई
बस पूनम के चाँद की कमी है 
तुम्हारे आने से वह हट जाएगी
और अधूरी बात पूरी हो जाएगी


xxxxx

रविवार, 27 अगस्त 2017

“अक्सर”

जब भी सूरज चन्द दिनों की खतिर
बादलों की रजाई ओढ़ जब
एकान्तवास में चला जाता है तो
प्रकृति गमगीन सी हो जाती है
तब एक हूक सी उठती‎ है सीने मे
और रगों में लहू के साथ
तुम्हारे साथ जीये खट्टे-मीठे
अनुभूत पलों की याद
बादलों में बिजली की सी
कौंध बन दिल  मे उतर  जाया करती है

    xxxxx

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

“त्रिवेणी"

   (1)


मखमली आवरण के स्पर्श‎ का अहसास
सदा मुलायमियत भरा नही होता ।


कभी कभी‎ उसमें  भी फांस की सी चुभन होती है ।।


                  ( 2)


रोज रोज यूं जाया ना करो
खालीपन अच्छा नही लगता ।
सांसो की जगह घबराहट दौड़ने लगती है ।।


                  (3)

अब की बार सावन झूम के बरसा था
सोचा सारा मैल धुल जाएगा ।

मगर काई तो वैसे ही जड़ पकड़े बैठी है ।।

XXXXX