Copyright

Copyright © 2024 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

शनिवार, 20 जून 2020

।। दोहे ।।


पीड़ा मन की बांटती, मैं रजनी के संग ।
माँ जाई तू बहन सी, छाया जैसा संग ।।

यामा,निशा,विभावरी , कितने तेरे नाम ।
तेरी राह निहारती ,जब चाहूँ आराम ।
                         
सुन के सब की फिर गुने ,बोले मन की बात ।
अपनी मैं के फेर में , शह बन जाती मात  ।।

दर्पण में छवि  देख के , मनवा करे गरूर ।
हिय पलड़े गुण तौलिए, जीवन क्षण भंगुर ।।

तम के संग प्रकाश है ,भोर करे संकेत ।
शीत-घाम के साथ तू , मन कर निज से हेत ।।

*****

27 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 20 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सांध्य मुखरित मौन में सृजन को साझा करने के लिए सादर आभार यशोदा जी ।

      हटाएं
  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२१ -०६-२०२०) को शब्द-सृजन-26 'क्षणभंगुर' (चर्चा अंक-३७३९) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. शब्द-सृजन अंक में सृजन को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार अनीता जी ।

      हटाएं
  5. बहुत सुन्दर दोहे।
    योग दिवस और पितृ दिवस की बधाई हो।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन हेतु सादर आभार आदरणीय सर ! आपको भी योग दिवस एवं पितृ दिवस की आपको भी बहुत बहुत बधाई।

      हटाएं
  6. दर्पण में छवि देख के , मनवा करे गरूर ।
    हिय पलड़े गुण तौलिए, जीवन क्षण भंगुर ।।
    बहुत सुन्दर ..

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन हेतु सादर आभार कविता जी ।

      हटाएं
  7. सुन के सब की फिर गुने ,बोले मन की बात ।
    अपनी मैं के फेर में , शह बन जाती मात ।।
    वाह!!!
    लाजवाब दोहे।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सरहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन का मान बढ़ा ..स्नेहिल आभार सुधा जी ।

      हटाएं
  8. ओ हो हो मीना जी

    पीड़ा मन की बांटती, मैं रजनी के संग ।
    माँ जाई तू बहन सी, छाया जैसा संग ।।


    ये तो बस क़त्ल लिख दिया आपने....माँ जाई तू बहन सी, छाया जैसा संग ।। ufffff बहुत ही प्यारी प् ंकियाँ लिखीं हैं

    यामा,निशा,विभावरी , कितने तेरे नाम ।
    तेरी राह निहारती ,जब चाहूँ आराम
    पहला दोहा ख़तम क्र अगले पे पाहुहकि तो फिर रुकना पड़ा । .वाह

    बहुत बहुत बधाई मीना जी
    बहुत होई अच्छे सुंदर दोहे हुए हैं \

    जवाब देंहटाएं
  9. आपकी ऊर्जात्मक सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से लेखन का मान और लेखन के लिए रूझान बढ़ जाता है जोया जी ! हृदय की असीम गहराइयों से स्नेहिल आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  10. रजनी को माँ जायी बहिन कहना बहुत प्रभावी लगा . बहुत सुन्दर दोहे हैं मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन सार्थक हो गया मैम । आप जैसी विदुषी की सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से .. सादर आभार 🙏

      हटाएं
  11. बहुत सुंदर दोहे मीना जी

    जवाब देंहटाएं
  12. हार्दिक आभार ज्योति जी ।

    जवाब देंहटाएं
  13. ओह!
    अद्भुत भावाभिव्यक्ति।
    इतने सुंदर और सार्थक दोहे मीना जी कभी कभी स्तब्ध हो जाती हूं आपकी असाधारण सृजन क्षमता से मैं अभिभूत हो जाती हूं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया मेरी लेखनी को ऊर्जा प्रदान करती है कुसुम जी । हृदयतल से आभार आपका ।

      हटाएं
  14. दर्पण में छवि देख के , मनवा करे गरूर ।
    हिय पलड़े गुण तौलिए, जीवन क्षण भंगुर ।।

    बहुत खूब ,सादर नमन मीना जी

    जवाब देंहटाएं
  15. पीड़ा मन की बांटती, मैं रजनी के संग ।
    माँ जाई तू बहन सी, छाया जैसा संग ।।
    वाह!! सरल, स्नेहिल दोहवाली 👌👌👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदय की असीम गहराइयों से स्नेहिल आभार प्रिय रेणु जी🌹🙏

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"