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सोमवार, 22 जून 2020

"क्षणिकाएँ"


झील किनारे...
बसी है बैया कॉलोनी,
सूखी शाखों पर ।
मेरे मन की सोचों जैसी...
थकान भरी और,
स्पन्दनहीन ।
🍁🍁🍁
सब कुछ तो है समय भी,  
और ...
समय की मांग भी ।
लेकिन...
मैं और केवल अपनी मैं के साथ,
दोनों...
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे ।
🍁🍁🍁
कछुआ सिमट जाये जैसे...
अपने ही खोल में
वैसे ही ...
खुद के खोल में डूबा मन
 बादलों में छिपे सूरज से...
अपने आंगन में
धूप का एक टुकड़ा मांगता है ...

🍁🍁🍁🍁

26 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब!!
    मीना जी मनोभावों को इतना गहनता से उकेरा है आपने
    जो सीधी हृदय तक उतरती हैं।
    शब्दों में दर्द बह रहा है जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है ।
    पाठक के हृदय को छूती एक सार्थक रचना।
    अभिनव।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. 🙏🙏 आभार कुसुम जी ! लेखनी को सार्थकता मिली आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से ..तहेदिल से पुनः शुक्रिया.।

      हटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 22 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार यशोदा जी मुखरित मौन में रचना साझा करने हेतु ।

      हटाएं
  3. सब कुछ तो है समय भी,
    और ...
    समय की मांग भी ।
    लेकिन...
    मैं और केवल अपनी मैं के साथ,
    दोनों...
    चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
    सबकुछ होते हुए भी अंतरमुखी मन यूँ ही अकेला रह जाता है सिर्फ अपने साथ..
    बहुत ही लाजवाब सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन को सार्थकता प्रदान करती प्रतिक्रिया के लिए स्नेहिल आभार सुधा जी ।

      हटाएं
  4. मैं और मेरा मैं ... किसी एक का मिटना कहाँ आसान ... मैं मिटा तो सब कुछ मिट गया ... दुसरे से ये मोह जाल ... माया का जाल ...
    अच्छी कक्षणिकाएं हैं सभी ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्षणिकाओं का मर्म स्पष्ट करती प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से आभार नासवा जी ।

      हटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर, सार्थक क्षणिकाएं

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक आभार अभिलाषा जी ।आपकी प्रतिक्रिया सदैव लेखनी को ऊर्जा प्रदान करती है ।

      हटाएं
  6. 🍁🍁🍁
    कछुआ सिमट जाये जैसे...
    अपने ही खोल में
    वैसे ही ...
    खुद के खोल में डूबा मन
    बादलों में छिपे सूरज से...
    अपने आंगन में
    धूप का एक टुकड़ा मांगता है
    बहुत ही खूबसूरत क्षणिकाएं ,

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना पा कर लेखन का मान बढ़ा..हार्दिक आभार ज्योति जी ।

      हटाएं
  7. वाह क्या सुंदर लिखावट है सुंदर मैं अभी इस ब्लॉग को Bookmark कर रहा हूँ ,ताकि आगे भी आपकी कविता पढता रहूँ ,धन्यवाद आपका !!
    Appsguruji (आप सभी के लिए बेहतरीन आर्टिकल संग्रह) Navin Bhardwaj

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार नवीन जी आपके ब्लॉग के आर्टिकल जरूर पढूंगी ।

      हटाएं
  8. मन के भावों को सुंदर शब्दों में पिरोया है आपने ,सादर नमन मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर नमस्कार कामिनी जी ! आपकी सुन्दर सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार ।

      हटाएं
  9. कहने को क्षणिकाएं हैं

    जीवन समेटे हैं खुद में ये
    हम अपने अपने खोल में सिमटे यही सोचते हैं की हम किस तरह का जीवन जी रहे हैं , मगर यहां हर कोई अपने ही खोल में घूम रहा हैं
    सोच को गहरे डुबो देने वाला सृजन , गहरे भावों को मज़बूत शब्दावली की माला में यूँ पिरोया है आपने की इक सुंदर रचना बन गयी
    सच आज हर मन अपने अंधेरों में घुलता इक """धूप का एक टुकड़ा मांगता है ..

    सदर नमन आपके लेखन को

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सराहना सम्पन्न समीक्षात्मक प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थकता दी । आपका स्नेह यूं ही बना रहे । असीम आभार जोया जी ।

      हटाएं
    2. कछुआ सिमट जाये जैसे...
      अपने ही खोल में
      वैसे ही ...
      खुद के खोल में डूबा मन
      बादलों में छिपे सूरज से...
      अपने आंगन में
      धूप का एक टुकड़ा मांगता है ...
      वाह! एक अलग ही तेवर की अत्यंत सराहनीय क्षणिकाएं प्रिय मीना जी 👌👌👌 सनेह और शुभकामनायें 🌹🌹🙏🌹🌹

      हटाएं
    3. आपकी सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से लेखन को सार्थकता मिली प्रिय रेणु बहन 🌹🙏 सस्नेह आभार ।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"