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सोमवार, 15 जून 2026

“भ्रम”

कुछ कहने -सुनने,समझने-समझाने
 की सारी बातें,
 यहीं छोड़ दें तो अच्छा है । 

दुनिया की उलझी हुई रस्में,
 रिश्तों और व्यवहारों का हिसाब-किताब
 इनसे किसी का कुछ 
 कभी अच्छा हुआ है भला।

व्यर्थ बातों में क्यों उलझना
सबके अपने-अपने स्वर्ग और नर्क हैं
 अपनी वैतरणी खुद ही
 पार करता है इन्सान ।

अक्सर हम दुनिया देखते हैं,
  उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं,
 सबके पीछे चलते हैं;
 और इसी अनुकरण की चक्की में
 धीरे-धीरे पिसते हैं।

शायद बेहतर हो कि
 हम एक-दूसरे से बात तो करें,
मगर अपने मन की भी सुने,
 और उस शोर से दूर रहें
 जो केवल भ्रम पैदा करता है ।

***


14 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपकी भावनाओं एवं विचारों से सहमत हूँ मीना जी। अंत में जो बात आपने कही है, वह आत्मसात करने योग्य है।

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  2. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार जितेन्द्र जी !

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  3. सही है, हर आत्मा को अपनी यात्रा अकेले ही करनी होती है, स्वयं को समझ कर ही दूसरों को समझा जा सकता है

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    1. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार अनीता जी !

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  4.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 18 जून, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  5. पांच लिंकों का आनन्द” में सृजन को सम्मिलित करने हेतु आपका सादर नमस्कार सहित आभार आदरणीय दिग्विजय जी ।

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  6. अनुभव की वैतरिणी
    चिंतन की पतवार
    लगाए पार ।
    अभिनंदन, मीना जी ।

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    1. सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक बधाई आभार सहित सादर नमस्कार नूपुरं जी !

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  7. हार्दिक आभार सहित सादर नमस्कार सर !

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मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"