आविर्भाव के साथ ही
धीमे- धीमे गीत गाती हैं
भोर की किरणें
स्वर्णिम सी उजास में उनकी
गुनगुनाहट
आँखें बंद करके मैंने
बहुत करीब से सुनी है
दिन भर की गहमागहमी में
यही गुनगुनाहट
कहीं खो सी जाती है
चाह कर भी सुनना चाहूँ
तो भी
दिन में मैं नहीं सुन पाती वह
मध्दम मधुर आवाज़
ढलती सांझ के
धुँधलके में धीमे-धीमे
सरकती सी
वह आती है मेरे समीप
मानो मुझसे कह रही हो —
जीवन का सार यही तो है
कुछ पाने की चाह में
हम दिन भर भागते रहते हैं
और अंततः
ठहरना ही सीखते हैं ।
***
वाह्ह दी कितने सुंदर भाव पिरोये हैं आपने
जवाब देंहटाएंसुंदर संदेश दिया है कि
इस दुनिया के शोर में, भाग-दौड़ में
कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झांको...
सहज, संवेदनशील और जीवन के गहरे दर्शन को उजागर करती सुंदर रचना दी।
सस्नेह
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आपके अनमोल उद्गारों ने लेखनी को सार्थक किया । पांच लिंकों के आनन्द में सृजन को सम्मिलित करने एवं सुन्दर सराहना हेतु स्नेहिल आभार सहित सादर नमस्कार श्वेता जी !
जवाब देंहटाएंआपकी यह काव्याभिव्यक्ति गागर में सागर सरीखी है मीना जी
जवाब देंहटाएंआपकी सारगर्भित अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।हार्दिक आभार आ. जितेन्द्र जी !
हटाएंकुछ पाने की चाह हमें दौड़ाती है और हर बार लाकर खड़ा कर देती है, पहले का सा रिक्त, सीखने को तैयार ही नहीं हैं हम, पर हर साँझ ऊर्जा से भर देती है, एक नयी शुरुआत के लिए, सुंदर सृजन मीना जी!
जवाब देंहटाएंआपकी अनमोल विचाराभिव्यक्ति से सृजन को मान मिला ।हार्दिक आभार अनीता जी !
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंआपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।हार्दिक आभार सर !
हटाएंहर साँझ ठहराव की सीख देती है और हर ठहराव फिर नयी भोर में भागने की ऊर्जा...
जवाब देंहटाएंबस यही जीवन है
बहुत सुंदर चिंतनपरक सृजन
वाह!!!!
आपकी अनमोल विचाराभिव्यक्ति से सृजन को मान मिला ।हार्दिक आभार सुधा जी !
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंआपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।हार्दिक आभार सर !
हटाएंअनुपम
जवाब देंहटाएंआपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।हार्दिक आभार मनोज भाई !
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