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शनिवार, 3 सितंबर 2016

“सवाल”

परसाईं जी ने कभी लिखा था-
“ पगडंडियों का जमाना है “
 बड़े दूरदृष्टा थे
 पहले ही भांप गए
 आने वाला कल कैसा है ?
 आजकल तो बस
 पगडंडियाँ ही पगडंडियाँ दिखाई देती हैं
 इन पगडंडियों की भीड़ में
 उनका क्या जो केवल
 सीधी राह चलते हैं .

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

" यादें"

फुर्सत के पलों में तेरे साथ जीया
हर लम्हा याद आता है।।

हफ्तों से गुमसुम बादलों से ढका
आसमान का वो खाली कोना याद आता है।

कोहरे की चादर संग बारिश मे भीगते हुए
तुमसे बिछड़ना याद आता है।

छोटी सी पहाड़ी उस पे मन्दिर
मन्दिर का दीपक याद आता है।

बादल बरसे या बरसी आँखें
आँखों का गीलापन याद आता है।

फुर्सत के पलों में तेरे साथ जीया
हर लम्हा याद आता है।।


XXXXX

सोमवार, 29 अगस्त 2016

"बीती बातें "

कुछ कहना, कुछ सुनना;
अब बीतें दिनों की बातें हैं
अनजानी सी, अनदेखी सी;
डोर का धागा, अब टूट सा गया है ।।
तेरे सपने, तेरे अपने;
दुनियादारी और समझबूझ की बातें
तुम को 'तुम सा'
बनने से दूर करती हैं ।।
तेरे मेरे बीच का अपनापन,
जैसे एक नदी के दो पाट;
रहें साथ, चलें साथ
लेकिन पाटों का अलगाव,
कुछ सोचने को मजबूर करता है ।।
तेरी समझदारी की लहरों के बीच,
मेरी नादानियों का निर्झर सूख सा गया है
दुनियादारी की भीड़ के बीच,
अपनेपन का एक भीगा सा कोना
कहीं छूट सा गया है ।।


XXXXX

शनिवार, 27 अगस्त 2016

"क्षणिकाएँ"

(1)
आजकल पता नही क्यों?
गुलाब खूबसूरत तो बहुत होते हैं
मगर उनमें खुश्बू नही होती
लगता है इनको भी शहरों की
लत लग गई है

(2)
मेरी लिखावट में कुछ कमी सी है
काम तो भारी है
ठीक तो करना ही पड़ेगा
कुछ काम गणित के सवाल होते है
समझ में जाए तो ठीक
ना आए तो जी का जंजाल होते हैं

(3)
बातों का मौसम भी अजीब होता है
तीखी बातें सर्द हवाओं की तरह होती हैं;
जब भी चलती हैं बस ठिठुरन बढ़ा जाती हैं  


(4)
तेरी यादों का पुल्लिन्दा तकिए के सिरहाने रखा है
फुर्सत के पलों में जब जी चाहा खोल लिया;
जब जी चाहा बाँच लिया


(5)
नफरत निभाना सब के बस की बात कहाँ?
इस के लिए भी मुहब्बत से अधिक;
शिद्दत की जरुरत होती है


XXXXX

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

"मंथन"

बादलों की चादर ओढ़े
आजकल वह बीमार सा दिखता है
हल्के नीलेपन संग
छिटपुट अश्रुकण यत्र-तत्र बिखरे
गीलेपन का अहसास दिलाते हैं

बावरा मन, मन का क्या?
मन तो खानाबदोश है
कितनी बार समझाया
पुरातन आवरण उतार देखो
सुनहरी धूप की चमक तीखी है

बर्फ भी पिघलने लगी है
मन की गाँठें खुलने लगी हैं
कागज के पुल बनने लगे हैं
रिश्तों की गठरी खोल दो
उसे भी अपनेपन की धूप दो


XXXXX

बुधवार, 11 मार्च 2015

"बचपन"

बचपन अपने आप मे एक सम्पूर्ण जीवन है. अनोखी कल्पनाएँ-बड़े होकर दुनिया का सब से बड़ा इन्सान बनने का सपना,ऐसे संसार की कल्पना जहाँ सारी कायनात केवल अपनी मुट्ठी मे कर लेने की कुव्वत,कुछ सोचना दूसरे ही पल उसे पाने का उल्लास बचपन का यथार्थ है बड़प्पन मे ये खुशियाँ कहीं खो जाती है.

         बालपन में माँ की साड़ी का पल्लू पकड़ कर बाजार

जाना,कपड़ों की दुकान मे अपने पसन्दीदा रंग के कपड़ों की तरफ अंगुली करना और उसे पा लेने पर खुशी से झूम उठना अक्सर याद आता है.अपनी कलाई की पहली घड़ी और दिल की धड़कनों के साथ घड़ी की टिक-टिक का  मखमली अहसास आज भी ना जाने कितने दिलों में सिहरन पैदा करता होगा  मगर ये सब बातें ,अहसास 70के दशक से 21वीं सदी की शुरुआत की बातें हैं. आज के दौर में ये बातें बेमानी हैं .पैसे की कीमत दिनोंदिन महत्वहीन हुई है. जो चीजें होश संभालने के बाद की बातें थी ; क़क्षा में अव्वल आने की खुशी की थी वे सब आज स्टेटस सिम्बल बन गई हैं . घड़ी पहनने के लिये कक्षा मे अव्वल आना अनिवार्य नही रह गया है. कपड़ों की रंगीन झिलमिलाहट का मखमली अहसास, माँ के हाथों से बने खिलौनों की चमक वक़्त के साथ कहीं खो सी गई  मैं यह नही कहती कि सब कुछ गलत है और आज की तरक्की, तरक्की नही है. मेरा मानना है कि बरगद,पीपल की छाँव अब कहीं खो सी गयी है. बोनसई वृक्षों की भरमार हो गई है जो मूल का ही रुप भी हैं और पहले से अधिक कहीं खूबसूरत भी  मगर नींव के साथ जुड़कर समाज को सुख देने के स्थान पर बेशकीमती सामानों से सजे मॉल्स और बड़े-बड़े बंगलों के स्वागत-कक्षों की शोभा बढाने मे ज्यादा सफल हैं .जिन्हे देख कर मेरे जैसे लोग कह उठते हैं-"बिलकुल वैसा ही है जैसा अपने गाँव मे स्कूल से आते रास्ते मे पड़ता

 था ; पता है स्कूल से आते बारिश और धूप मे हम इनके नीचे खड़े हो जाते थे.” और बात पूरी होने से पहले ही अचानक घूरने के अहसास से बगल में खड़े व्यक्ति की अजीब सी नजरों से बचते हुए मैं खामोशी की चादर ओढ़ कर आगे बढ़ जाया करती हूँ.

मंगलवार, 3 मार्च 2015

"उड़ान"

उसे भी हक दो
वह भी उडना चाहती है,
उसकी परवाजें भी 
तुम्हारी तरह. 
आसमान को छूना चाहती है.
क्यों अनचाहे झपट्टे से
उसके हौसले को 
तोडना चाहते हो?
देखो वह कितनी डरी है
रात भर 
उसकी पनीली आँखों मे,
तुम्हारा ही खौफ तैरता रहा.
क्या जीने का हक 
केवल तुम्हारा ही है,
तुम्हे मालूम भी है ?
कल से उसने ना चुग्गा खाया,
ना पानी पिया.
अब तो भोर हो गई है
बीती बातें बिसार दो.
उसको आवाज दो
हौंसला दो,
वह भी तुम्हारी ही तरह
 स्वछन्द होकर,
असीम आसमान की
ऊचाईयाँ छूना चाहती है.