(1)
बहते दरिया सा हो जीवन
करें सुकर्म रखें पुनीत मन
प्रगति पथ पर बढ़ते जाएँ
राग-द्वेष का कलुष मिटाएँं
राग-द्वेष का कलुष मिटाएँं
निर्मल जल सा अपना हो मन
ज्योतिर्मय हो सब का जीवन
ज्योतिर्मय हो सब का जीवन
( 2 )
डाल से विलग पत्ती
ब्याह के बाद बेटी
अपनों से बिछड़
गैर सी आंगन में खड़ी
गैर सी आंगन में खड़ी
दिल में कसक
लबों पे मुस्कुराहट
दृगों में नमी और
गुम वजूद की चाहत
XXXXX