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शनिवार, 12 अक्टूबर 2019

"त्रिवेणी"

(1)

गहरे में उतरो तो ही मिलते हैं मोती ।
उथले में तो काई-गारा ही हाथ लगता है ।

उत्कृष्टता वक्त और हुनर मांगती है ।।

(2)

खिड़कियों का अस्तित्व ताजगी से जुड़ा है ।
व्यर्थ आगमन बहिर्गमन के लिए नही ।

अनावश्यक हस्तक्षेप से मर्यादाएं टूटती हैं ।।


                                  (3)

          चलते रहना है अनवरत गंतव्य तक ।
रूकना और मुड़ कर देखना कैसा ?

नदियों का स्वभाव लौटना नहीं होता ।।

★★★★★

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

"अलविदा"

अलविदा कहने का वक्त आ ही गया आखिर.. मेरे साथ रह तुम भी खामोशी के आदी हो गए थे । अक्सर हवा की सरसराहट तो कभी गाड़ियों के हॉर्न
कम से कम मेरे को अहसास करवा देते कि दिन की गतिविधियां चल रहीं हैं कहीं । 'वीक-एण्ड' पर मैं अपने मौन का आवरण उतार फेंकती तो तुम भी मेरी ही तरह व्यस्त और मुखर दिखते ।
चलने का समय करीब आ रहा है । सामान की पैकिंग हो रही है सब चीजें सम्हालते हुए मैं एक एक सामान  सहेज रही हूँ । महत्वपूर्ण सामान में तुम से अपने से जुड़ी सब यादें भी स्मृति-मंजूषा में करीने से सजा ली हैं । फुर्सत के पलों में जब मन करेगा यादों की गठरी खोल कर बैठ जाऊँगी.. गाड़िया लुहारों की सी आदत हो गई थी मेरी आज यहाँ तो कल वहाँ । जो आज बेगाना है वह कल अपना सा लगेगा..मुझे भी..तुम्हे
 भी ।  मेरी यायावरी समाप्त हो रही है । ईंट-पत्थरों के जंगल में ढेर सारी बहुमंजिली इमारतों के बीच 'मनी प्लांट' सा मेरा घर प्रतीक्षा कर रहा मेरी..मेरी स्मृतियों में तुम खास रहोगे… सदा सर्वदा..।।

★★★★★

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

"क्षणिकाएँँ"

(1)
मानो या ना मानो 
दिल की धडकनों जैसा
बेशुमार लगाव है तुम से
जेनेटिक प्रॉब्लम की सुनते ही
उसके लिए भी तो यूं ही 
बेहिसाब प्यार छलका था
जैसे तुम्हारे लिए छलकता है
प्रतिदिन… प्रतिपल...
(2)
अजीब सी 
हलचल होती है 
दूध के उबाल सी….
जब कहीं विनम्रता को
                         निर्बलता समझ
                            लिया जाता है
दादुर के वक्ता होने पर
कोयल का मौन
कोयल की कमजोरी नहीं
उसका अपना मूड है
(3)
 रिश्तों में गाढ़ापन हो तो
संबंधों में प्रगाढ़ता होती है 
ठहराव के साथ….,
फिर रक्त का गाढ़ापन
जिन्दगी के लिए
खतरनाक और उसके
ठहराव में बाधा कैसे….,
कला और विज्ञान में
यहीं मूलभूत फर्क है
तथ्यों को सत्यता की खातिर
दोनों के अपने अपने तर्क हैं

                           ✴️✴️✴️









शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

"मुक्तक"

"मुक्तक"
( 1 )
मानव की यह आदत पुरानी है नई नहीं है ।।
सीखा नहीं कल से कुछ क्या ये सही है ।।
दिवास्वप्नों में खोया यह भी नही जानता ।
आने वाले कल की नींव आज पर धरी है ।।
(2)
तीखे तंज सहन करना सीख लोगे ।
समझो आधी दुनियां जीत लोगे ।।
वक्त सीखा देता है जीने का ढंग ।
मार्ग के कंटक भी स्वयं बीन लोगे ।।
(3)
सज़दे में झुकता सिर ऐसे शूरवीरों के आगे
कर देते तन-मन न्यौछावर मातृभूमि आगे
जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा हुआ हर कोई
मृत्यु भी नमन करती ऐसे वीरों के आगे
★★★

रविवार, 22 सितंबर 2019

"खुशी"

अपना वजूद भी इस दुनिया का एक हिस्सा है उस पल को महसूस करने की खुशी , आसमान को आंचल से बाँध लेने
का  हौंसला , आँखों में झिलमिल - झिलमिलाते  सपने और आकंठ हर्ष आपूरित आवाज़ -
                                        “ मुझे नौकरी मिल गई है , कल join करना है वैसे कुछ दिनों में exam भी हैं……, पर
मैं सब संभाल लूंगी।” कहते- कहते उसकी आवाज
शून्य में खो सी गई । मुझे खामोश देख
वो फिर चहकी - “ मुझे पता है आप
अक्सर मुझे लेकर चिन्तित होती हो , मैंंने सोचा सब से
पहले आप से खुशी बाँटू। “
                  मैं सोच रही थी अधूरी पढ़ाई , गोद में बच्चा , घर की जिम्मेदारी और ढेर सारे सामाजिक दायित्व । ये भी नारी का एक रुप है कभी बेटी , कभी पत्नि तो कभी जननी । हर रूप में अनथक परिश्रम करती है और अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अवसर की तलाश में रहती है ।अवसर मिलते ही पल्लवित होती है अपनी  पूर्ण सम्पूर्णता के साथ।
                   दमकते चेहरे और उसके बुलन्द हौंसलों को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई और यकीन हो गया कि एक दिन फिर वह निश्चित रूप सेे इस से भी बड़ी खुशी मुझसे बाँट कर मुझे चौंका देगी ।

XXXXX

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

"ठौर"

 
तिनका तिनका जोड़ 
तरु शाखाओं के बीच
बड़े जतन से उन्होंने
बनाया अपना घर

सांझ ढलते ही पखेरू
अपना घर ढूंढ़ते हैं
 यान्त्रिक मशीन ने
कर दी उनकी बस्ती नष्ट
टूटे पेड़ों को देख कर
विहग दुखित हो सोचते हैं

उनके घर की नींव पर
बहुमंजिल भवन बनेंगे
हर शाख घरों से पटी होगी
कंक्रीट के जंगल में
हर जगह मनु के घर होंगे

विकलता पर कर नियन्त्रण
पंछी दल चिन्तन करता है
सामर्थ्य हीन मानव
अपने दम पर कब पलता है
हम ढूंढे ठौर कोई
यह वही कदम धरता है 

सामर्थ्य सबल है अपना
हम और कहीं रह लेंगे
रहने दो इसे यहीं पर
हम नई ठौर कर लेंगे

★★★★★














               





                 














शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

"खामोशी"

खामोशी का मतलब
बेज़ारी नही होता
और मूर्खता तो कभी नही
कुदरत ने  हमें बख़्शी है
बोलने के लिए एक जुबान
और सुनने को  दो कान

सुनना और सुन कर गुनना
अहम् अंश हैं जीवन के
नीरवता में फूटता संगीत
देता सीख व्यवहार की
और फूंकता है प्राण
सुप्तप्राय: नीरस मन में

एकांत की शांति में
 द्रुम-लताओं के बीच से
बहता मंद समीर
कानों में रस घोलता
पखेरुओं का मीठा कलरव
मोती सदृश बरखा की बूँदें
धरा पर जब
मद्धिम मद्धिम गिरती हैं
बस खामोशियाँ 
गुनगुनाने लगती हैं

★★★★★
(चित्र-गूगल से साभार)