गहमागहमी..
बेतहाशा हताशा
के दौर में ..
मन की निराशा
किसी कलमकार के
मन की..
अंत:सलिला
बन बहती है
काग़ज और कलम
के साथ
नहीं उकेरे जाते
चंद अक्षर..
एक संगतराश
जैसे हाथ मिलते हैं
दिलो-दिमाग के साथ
और
अनगढ़ से भावों को
तराशते हैं ..
अभिव्यक्ति में
जो दीप्त है
ऊषा किरण सी
खिलते पुष्प सी
कभी-कभी
अश्रुबिंदु सी..
ढलती हैं
करूणा के सागर में
तब जा कर …
सृजित होती है
शिशु मुस्कान सी
एक कविता..
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